जो सीटें थीं नाक का सवाल वहां नाक ही कट गई: भाजपा के तीन-तीन दिग्गज-नहीं बचा पाए इज्जत

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नगर निगम होशियारपुर के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन जहां काफी शर्मनाक रहा वहीं शहर में बैठे तीन-तीन भाजपा दिग्गज नेता भी नाक बचाने में नाकामयाब साबित हुए। तीनों दिग्गजों के लिए तीन सीटें तो पूरी तरह से नाक का सवाल थी और तीनों में उन्हें करारी हार मिली। जिसके चलते भाजपा की गुटबाजी से पार्टी के भीतर भर रहा जहर और भी जगजाहिर हो गया तो दूसरी तरफ भाजपा उम्मीदवारों की हार नहीं बल्कि इन दिग्गज नेताओं की हार समझी जा रही है, क्योंकि उम्मीदवारों को विश्वास था कि इनके मुंह को जनता वोट जरुर करेगी, लेकिन हुआ इससे पूरी तरह से उलट। जनता ने न केवल इनके उम्मीदवारों को नकार दिया बल्कि अन्य सीटों पर भी भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। जो उम्मीदवार जीते उनके बारे में बात की जाए तो उनके द्वारा पिछले काफी समय से वार्ड में मेहनत की जा रही थी और उनके अपने चेहरे को भी जनता ने कबूल करते हुए उनके पक्ष में मतदान किया। इसमें पार्टी नेताओं के योगदान की बात करें तो वो नाकाफी ही रहा। हालांकि जीते हुए अधिकतर उम्मीदवार तीक्ष्ण गुट के माने जाते हैं तथा जीत के बाद उन्होंने तीक्ष्ण सूद से आशीर्वाद भी लिया। भाजपा के विजेता रहने वाले उम्मीदवारों में वार्ड नंबर 36 से सुरिंदर भट्टी, 33 से गुरप्रीत कौर, 16 से नरिंदर कौर व वार्ड 41 से गितिका अरोड़ा ने पार्टी की इज्जत बचाने में कामयाबी हासिल की तथा इसे बहुत बड़ी कामयाबी के रुप में देखा जा रहा है।

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लालाजी स्टैलर की राजनीतिक चुटकी

राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं की बात करें तो वार्ड नंबर 1 से सुरिंदर कौर जोकि सांपला ग्रुप की मानी जा रही थी व नेता जी व उनकी टीम का काफी सरगर्मी के साथ सुरिंदर कौर को जिताने में लगे हुए थे। मगर, नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा और सुरिंदर कौर को हार का मुंह देखना पड़ा। वार्ड 5 की बात करें तो वहां पर पूर्व कैबिनेट मंत्री तीक्ष्ण सूद ने अपनी पत्नी पूर्व पार्षद राकेश सूद को मैदान में उतारा था और यह सीट सूद के लिए काफी अहम थी, लेकिन इस सीट से भी भाजपा को हाथ धोना पड़ा। इसके अलावा तीसरी सीट थी वार्ड नंबर 35 जहां से पूर्व भाजपा जिला अध्यक्ष विजय अग्रवाल की बहु मेघा बांसल को चुनाव मैदान में उतारा गया था और अग्रवाल पूर्व सांसद अविनाश राय खन्ना के गुट के माने जाते हैं और खन्ना का भी इस सीट पर विशेष ध्यान केन्द्रित था। लेकिन वे भी इस सीट को पार्टी की झोली में नहीं डलवा सके।

शर्मनाक हार के बाद भाजपा के भीतर ही नहीं बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाओं का बाजार पूरी तरह से गर्म हो चुका है। क्योंकि, पिछले 20 सालों से भी अधिक समय से भाजपा द्वारा स्थापित किए गए अभेद किले में दूसरों ने कम अपनों ने सेंधमारी ज्यादा की है। जिसका परिणाम है कि पहले एक गुट था, फिर दो हुए और फिर तीन गुट अपने-अपने स्तर पर काम करते हुए सक्रिय हो गए। हालांकि तीनों का तर्क एक ही रहा कि वे तो पार्टी के लिए काम कर रहे हैं, भले ही अलग-अलग हैं। लेकिन वे भूल गए कि एकता में बल वाली कहाबत आज भी उतरी ही चरितार्थ है जितनी पहले थी। हालांकि इस बार के पीछे किसान आंदोलन को लेकर भाजपा को झेलना पड़ा रहा रोष भी एक कारण माना जा रहा है, लेकिन शहरी तबके पर इसका असर इतना नहीं है कि वे भाजपा को वोट ही न करें। अब कोई जो भी बहाना बनाए या हार का ठीकरा एक दूसरे पर फोड़ें, लेकिन सच्चाई तो यह है कि भाजपा नेताओं ने जिस प्रकार इन तीनों सीटों पर जोर लगाया, अगर शहर की अन्य सीटों पर भी ऐसे ही जोर लगाया होता तो शायद परिणाम आने पर कुछ तो नाक बचती।

कैडर वोटर भी पार्टी नेताओं व पार्टी द्वारा देरी से फैसले लिए जाने से नाराज ही दिखा तथा कहीं न कहीं उसकी नाराजगी भी पार्टी को भारी पड़ी। जिला प्रधान निपुण शर्मा की बात करें तो जिस दिन से जिला अध्यक्ष की कमान निपुण के हाथ में आई है उसी दिन से वे तो यह साबित करने में लगे हैं कि वे कोई बड़े नहीं बने बल्कि उन्हें यहां पहुंचाने वाले ही जिला प्रधान के पद पर आसीन हुए हैं। इसके अलावा उनके द्वारा अपनी स्तर पर कोई ऐसी टीम तैयार न करना व उसे चुनाव प्रचार में डटा देने वाली रणनीति पर भी कार्य नहीं किया गया। राजनीतिक माहिरों की मानें तो ऐसा शायद इसलिए हुआ कि अगर वे अपनी टीम खड़ा करके काम करते तो शायद उनके आका को यह बात बुरी लगती है हो सकता था कि परिणाम इससे भी बुरे आते। जिस प्रकार अकाली दल का यहां खाता भी नहीं खुला तो उसी प्रकार भाजपा भी शायद जीरो पर ही सिमट कर रह जाती। पत्रकारवार्ता में अकसर ही भाजपा नेताओं से एक बात पूछी जाती रही है कि आखिर भाजपा की गुटबाजी को दूर करने के लिए सख्त फैसले क्यों नहीं लिए जा रहे तो पार्टी नेताओं का जवाब होता था कि गुटबाजी नहीं है और सभी एक हैं व पार्टी के लिए कार्य करते हैं। अब जबकि निगम चुनाव में भाजपा को मुंह का खानी पड़ी तो ऐसे में शायद वे पत्रकारों के सवालों के जवाब भी ढूंढकर सामने आएंगे। भाजपा की युवा टीम में सरगर्म नहीं दिखी, जिसके कारण युवा वर्ग भाजपा से कटा-कटा दिखा और जब युवा ही कटा-कटा रहेगा तो वोट परसंटेज पर असर पडऩा तो स्वभाविक है।

इतना ही नहीं भाजपा के कई नेताओं एवं कार्यकर्ताओं द्वारा कांग्रेस, अकाली दल एवं आप को समर्थन किए जाने की भी चर्चाएं गर्म रहीं तथा कहीं न कहीं यह एक-दूसरे नेता के प्रति नाराजगी ही थी कि वे एक-दूसरे के उम्मीदवार को हराने की जुगत भिड़ाते रहे। यहां तक कि चर्चा तो यह भी है कि वोट प्रतिशत को प्रभावित करने वाले असर रसूख वाले लोगों को फोन करके भी बोला गया कि वोट किसके पक्ष में करें। अब इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा के भीतर कितना ठीक और कितना कुछ गलत चल रहा है और पार्टी किस प्रकार गिरती, ढहती और थक्का लगाकर सांसे गिनती हुई चल रही है तथा इसके पीछे भाजपा के दिग्गज नेताओं की आपसी फूट और गुटबाजी के कारण बंटा हुआ कार्यकर्ता किस प्रकार तरक्की कर सकता है का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। अब देखना यह होगा कि इस हार से भाजपा हाईकमान क्या सबक लेती है और आने वाले समय में भाजपा की मजबूती और एकजुटता के लिए कैसे कदम उठाए जाते हैं।

क्या? हमारे सांसद एवं केन्द्रीय राज्य मंत्री सोम प्रकाश जी कहां रहे इन चुनावों में। तो भाई उन्होंने सिर्फ होशियारपुर ही नहीं देखना, फगवाड़ा, टांडा, मुकेरियां, श्रीहरगोबिंदपुर, भुल्लथ तथा अन्य स्टेशन भी देखने थे तो साबिह तो अपनी ड्यूटी बजाते रहे और शहर की तरफ उन्होंने भी अधिक ध्यान देना व नेताओं को एक मंच पर लाना जरुरी नहीं समझा। जिसके चलते हार और हार में बदलती नजऱ आई व भाजपा हार ही गई। हां! इतनी गनीमत रही कि आम आदमी पार्टी से दो सीट आगे रहकर पार्टी नेताओं ने रिकोर्ड कायम कर दिया कि कम से कम आप से तो आगे रहे, हार जीत तो लगी रहती है। जय राम जी की।

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