
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। लोकतंत्र के चार स्तंभों में न्यायपालिका की मजबूती अधिवक्ताओं की निर्भीकता और सुरक्षा से सीधे जुड़ी है। यदि न्याय की प्रक्रिया में सहभागी अधिवक्ता ही असुरक्षित हों, तो आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा की कल्पना अधूरी रह जाती है। हाल की एक गंभीर घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि देश में “अधिवक्ता संरक्षण अधिनियम” (Advocate Protection Act) अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन, चंडीगढ़ के मानद सचिव गगनदीप जम्मू ने खुलासा किया कि बार के सदस्यों द्वारा एक आपातकालीन जनरल हाउस बैठक बुलाई गई, जिसमें पीड़ित अधिवक्ता स्वयं उपस्थित रहे। बैठक में यह गंभीर आरोप सामने आए कि सीआईए-1, हिसार के अधिकारियों द्वारा अधिवक्ता के साथ उत्पीड़न, मारपीट और आपराधिक अतिक्रमण किया गया।

इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह रहा कि पुलिस स्टेशन नयागांव, मोहाली (पंजाब) में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए की गई मांगों के बावजूद, एडवोकेट जनरल, पंजाब से निवेदन किए जाने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यह घटना केवल एक अधिवक्ता की नहीं, बल्कि पूरे अधिवक्ता समुदाय की गरिमा और सुरक्षा से जुड़ी है। अधिवक्ता न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैंl वे पुलिस, प्रशासन और आम नागरिक के बीच कानून के दायरे में संतुलन बनाए रखते हैं। जब वही अधिवक्ता अपने पेशेगत कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान हिंसा, धमकी या उत्पीड़न का शिकार होते हैं और उन्हें त्वरित कानूनी संरक्षण नहीं मिलता, तो यह न्याय के शासन (Rule of Law) पर सीधा आघात है।
आज देश में डॉक्टरों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों के लिए संरक्षण कानूनों पर विचार होता है, तो फिर अधिवक्ताओं के लिए समर्पित संरक्षण अधिनियम क्यों नहीं? एक प्रभावी अधिवक्ता संरक्षण अधिनियम में निम्नलिखित प्रावधान अनिवार्य होने चाहिए अधिवक्ताओं पर हमले, धमकी या उत्पीड़न को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए, ऐसे मामलों में तत्काल एफआईआर और समयबद्ध जांच का प्रावधान हो, ड्यूटी के दौरान अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु उत्तरदायित्व तय किया जाए, दोषी अधिकारियों/व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए बार एसोसिएशन द्वारा उठाया गया कदम किसी टकराव के लिए नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान की रक्षा के लिए है। यह सरकार और प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश है कि अधिवक्ताओं की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर अधिवक्ता संरक्षण अधिनियम को शीघ्र लागू करें, ताकि न्याय की आवाज़ निर्भीक बनी रहे और कानून के रक्षक स्वयं कानून की उपेक्षा के शिकार न हों।न्याय तभी जीवित रहता है, जब उसके प्रहरी सुरक्षित होते हैं।












