
अमृतसर (द स्टैलर न्यूज़)। सुखबीर बादल पर नारायण सिंह चौड़ा का अटैक नहीं हो सका। बहादुर पुलिस कर्मी की वजह से उनका जीवन बच गया। यह ईश्वर का शुक्र है, पर अकाली नेतृत्व को यह बताना होगा कि जब 1983 में श्री हरिमंदिर साहिब के बाहर डीआईजी अटवाल की हत्या की गई, उसके पार्थिव शरीर के आसपास भंगड़े डालकर उसके शरीर का अपमान किया गया उस समय सारे नेता लोग खामोश क्यों रहे? दुर्दांत आतंकवादी नारायण सिंह को किसने आत्मसमर्पण करवाने में सहयोग दिया था। बुड़ैल जेल तुड़वाकर बेअंत सिंह के कातिलों को भगाने वाला नारायणय सिंह चौड़ा किस प्रकार खुला घूमता रहा। जेल के बाहर रहकर दो बार बिजली गुल करवाने वाला और जेल के अंदर जनरेटर भी बंद हो जाए इसका प्रबंध करवाने वाले तथा पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह तथा अन्य 11 लोगों के हत्यारे जगतार सिंह हवारा, परमजीत सिंह भ्यौरा और देवी सिंह जैसे दुर्दांत आतंकियों को भागने में सहायता करने वाला नारायण सिंह खुला क्यों छोड़ा?

सीधी बात है जब कांटे बीजेंगे तो आम नहीं मिलेंगे। अब भी सरकार को यह सबक लेना चाहिए कि जो आतंकवादी माफी देकर या आत्मसमर्पण करवाकर या राजनीतिक लाभ के लिए किसी भी पार्टी ने पूरे देश में खुले छोड़े हैं उन पर निगाह रखी जाए और अगर वे अपराध की दुनिया से जुड़े हैं तो उन्हें कानून के घेरे में बंद किया जाए। याद रखना होगा कि बोये पेड़ बबूल के तो आम कहां से होय। सुखबीर बादल और अकाली दल को अब बताना होगा कि नारायण सिंह चौड़ा ने आत्मसमर्पण किस सरकार के समय में किया था।












