Sunday, October 25, 2026
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नेताओं की फिरकी: उलझन में जनता, मौज में नेता

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Editors opinion. . BY. .Sandeep Dogra

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-कोई जीत कर भी हारा तो कोई हार कर भी भोग रहा सत्ता का सुख-खेमेबाजी में उलझे कई कार्यकर्ताओं के लिए राजनीति बनी टेढी खीर-
होशियारपुर में राजनेताओं की बात करें तो सत्तापक्ष से जुड़े कुछ नेताओं पर आजकल सभी का ध्यान केन्द्रित है, क्योंकि केन्द्र में अच्छे दिनों का सपना दिखाकर पहुंची मोदी सरकार के सिपाहियों की कथनी व करनी सभी को अचंभित करती जा रही है। होशियारपुर में एक से बढक़र एक नेता हैं। एक राजनेता जो हार के बाद भी जीत का सेहरा पहने अपनी हकुमत को कुछ इस कद्र चला रहे हैं कि उनके दरबार से जब तक हरी झंडी नहीं हो जाती तब तक शहर में कोई कार्य नहीं होता। इसके चलते समस्या का समाधान हो या समारोह कैसा भी हो उनकी उपस्थिति जहां कुछ लोगों के लिए अनिवार्य हो चुकी है वहीं अन्य के लिए मजबूरी बन चुकी है। पर एक बात मानी जाती है कि जो भी उनके साथ जुड़ गया वो तर गया। कद में काफी बड़े नेता होने के बावजूद उनका ध्यान गलियों-नालियों तथा ट्यूबवैल के उद्घाटन तक ही सीमित रहता है। विभाग कोई भी हो उनके हुक्म के बिना वहां कोई कार्य पास कैसे हो जाए, तो वहीं नगर निगम भी अपने स्तर पर कोई फैसला करने में असमर्थ दिखाई देती है। भले ही वहां बैठे सत्ताधारी हाउस में लिए जाने वाले फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया फैसला बताएं, परन्तु फैसले के पीछे की मजबूरी और हिदायतों को सब बाखूबी समझते हैं। शतरंज के माहिर खिलाड़ी की तरह नेताजी अपनी सत्ता कायम रखने और आदेश को लागू करवाने के लिए ऐसा तानाबाना जिसे चक्रव्यू कहा जाए तो गल्त नहीं होगा बनाने में कामयाब हो चुके हैं कि कोई उससे बाहर निकल ही नहीं सकता। अगर कोई निकलने की कोशिश करता है तो उसे सदा के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है और नेता जी के खासमखास कहे जाने वाले उस कार्यकर्ता को किसी अन्य नेता की शरण लेनी पड़ती है ताकि वह नेताजी के कोप से बच सके। अगर किसी जिला व ब्लाक स्तरीय पार्टी नेता को कोई काम कह दिया जाए तो फरियादी को एक ही जवाब मिलता है कि कोठी आ जाओ देख लेते हैं। पर कोठी का चक्कर कितनी बार लगाना पड़े इस बारे में कोई स्पष्ट रूप से नहीं बता सकता। ऐसा प्रतीत होता है मानो सत्ताधारियों के लिए कोठी किसी तीर्थ से कम नहीं। अब यह कोठी का क्या माजरा है यह तो वही जाने पर कुछ राजनीतिक माहिर तो नेताजी के दरबार को विकास की धारा का जन्म स्थल कहकर चुटकी लेने से खुद को रोक नहीं पाते।

…नेता जी हमारी बारी कब आएगी?

सत्तापक्ष से जुड़े एक नेता ऐसे हैं जो आजतक केवल अपना आप ही संवारने में कामयाब हुए और उनके साथ जुड़े जिला व ब्लाक स्तर तक पार्टी से जुड़े नेता अपने नेता की तरफ टकटकी लगाए आजतक अपनी बारी के इंतजार में हैं कि शायद कहीं उनकी झोली में भी कोई पद गिरे। एक हल्के से जिला, जिले से प्रदेश और अब केन्द्र में नेताजी की अच्छी तूती बोलती है। मगर हैरानी की बात यह रही कि उनके साथ जो-जो भी जुड़ा व जुड़ रहा है उनमें से केवल एक को ही सफल माना जा रहा है और उसके पीछे उसकी अपनी कितनी मेहनत है यह भी किसी से छिपा नहीं है। अन्य के हाथ में सत्ता का स भी नहीं लगा इसकी जानकारी सभी को है व कई तो इसकी आस भी छोड़ चुके हैं। हालांकि कोशिश इस नेता की भी यही रहती है कि उनके कार्यालय में जनता की भीड़ दूसरे से अधिक लगी रहे, पर अब तो उनक खासमखास भी वहां जाने से परहेज ही करने लगे हैं। हाल ही में इस नेता ने एक कालेज में युवा वर्ग को देश में रहकर देश सेवा करने व नशों से दूर रहने का संदेश देने हेतु कार्यक्रम करवाया। इस दौरान उक्त नेता द्वारा नशे से बचाव संबंधी पैंफलैट भी वितरित किए गए। मगर हैरानी उस समय हुई जब पैंफलैट पढक़र विद्यार्थियों ने कहा कि एक तरफ तो नेता जी युवाओं को विदेश न जाने की सलाह दे रहे हैं तो दूसरी तरफ पैंफलैट इमीग्रेशन वालों से स्पांसर करवा रखा है। विद्यार्थियों का कहना था कि दोहरे मापदंड अपनाकर आखिर ऐसे नेता क्या सिद्ध करना चाहते हैं?

यह भी क्या खूब फंसे…

शहर के दो बड़े नेताओं के बारे में तो आप मेरा इशारा समझ ही गए होंगे। मगर एक नेता ऐसे भी हैं जो सत्तापक्ष से जुड़े एक खेमे के माने जाते थे, पर अब उनके लिए भी आगे खाई और पीछे कुएं जैसी स्थिति मानी जा रही है। भले ही वे अपने हल्के में कम ही दिखाई देते हैं पर उक्त दोनों खेमों (एक खेमे से कम तो दूसरे से ज्यादा, भले ही दिखावा न करते हों) से नाराज व गुप्तचर की भूमिका के लिए कुछ लोग उनके साथ भी आ जुड़े हैं। नेता जी की हालत तो ऐसी मानी जा रही है कि अब वे अपने पुराने साथी को छोड़ अपने स्तर पर काम कर नहीं सकते और दूसरे से जुड़ नहीं सकते। हालांकि वे फिर भी जी तोड़ मेहनत से कार्य करवाने में लगे हैं, पर रफ्तार धीमी मानी जा रही है। पर अब नेताजी करें तो क्या करें। आलम यह है कि नेताओं की आपसी फिरकी में होशियारपुर की जनता समझ ही नहीं पा रही कि आखिर हो क्या रहा है। उनके लिए तो अपने नेताओं की कार्यप्रणाली और राजनीति किसी पहेली से कम नहीं।

…लो जी इनको भी आ गई बातें

इसी बीच कुछ पुरानी व एकाध नई पार्टी से जुड़े नेताओं को भी इन दिनों काफी चुस्ती सूझ रही है और वे ऐसे बयान देने में लगे है मानो जनता के असली शुभचिंतक वहीं हों। खुद को जनता का शुभचिंतक कहने वाले यह नेता तो ऐसे हैं जिन्हें हर काम में कोई न कोई बुराई जरुर दिख जाती है और बस फिर क्या इनको तो मौका मिल जाता है सत्ताधारियों के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने का। बड़े कद के नेता तो बात करें, मगर कुछ ऐसे तथाकथित नेता भी हैं जो अपने कद से बड़े नेता पर बोलने से भी परहेज नहीं करते। पर ऐसे सभी नेताओं पर अंगूर खट्टे हैं वाली कहावत पूरी तरह से चरितार्थ होती नजर आती है। ऐसे में आप खुद समझ सकते हैं कि शहर की जनता किन दो पाटों में पिसती जा रही है।

…इनके अपने ही खींच रहे टांग

विपक्ष से जुड़े एक नेता जी का हाल तो देखिए। उन्हें देख कर ही आपको एहसास हो जाएगा कि जीत कर भी हार जाना किसे कहते हैं। भले ही वे जनता की सुविधाओं को देखते हुए जेब से खर्च करने से भी परहेज न करते हों, मगर आखिर सत्ता विहीन एक नेता करे तो क्या करे। अगर वे कुछ करने का प्रयास करता भी है तो उसकी पार्टी के उससे नाराज नेता उसकी कोशिशों को सफल ही नहीं होने देते। जिसके चलते विपक्ष होते हुए भी जनता के हकों के लिए उठी आवाज दब कर रह जाती है। फिर भले ही वे आवाज राजनीति से प्रेरित अपना अस्तित्व कायम रखने की लड़ाई।

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