
बरनाला (द स्टैलर न्यूज़), हरप्रीत छन्ना। हर साल, दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सर्दियों में घातक वायु प्रदूषण का सामना करना पड़ता है, जो कि एक ऐसी घटना है जिसमें सर्दियों की शुरुआत के दिनों में धुंध के जहरीले बादल इस क्षेत्र को घेर लेते हैं। इस घातक वायु प्रदूषण के कई कारण हैं जिनमें से एक पराली जलाना है जो दिल्ली में लगभग 30% प्रदूषण में योगदान देता है।

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों के किसान सर्दियों में धान की फसल की कटाई के बाद पराली जलाते हैं जो वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों में से एक के रूप में जिम्मेदार ठहराया गया है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस संकट से निपटने के लिए अपने अपने सुझाव देते आये हैं। इस मुद्दे पर चिंतन करते हुए अखबारों में भी कई लेख आते रहे हैं और सरकारी थिंक टैंक और अनुसंधान संगठन संबंधित अधिकारियों को तत्काल प्रभावी कदम उठाने के लिए कहते हैं फिर भी हर साल पराली जलाने वाले किसानों के सामने राज्य बेबस और कमजोर नजर आता है। विडंबना यह है कि किसान ऐसा करने के लिए यह दलील देते हैं कि रबी की नई फसल समय पर करने के लिए उनके पास पराली को जलाने के अलावा कोई चारा नहीं है। वे बुवाई के दबाव के चलते खुद को असहाय महसूस करते हैं। कुछ गैर सरकारी संगठन और संस्थान पराली जलाने को रोकने के लिए, संसाधनों व उपकरणों की मदद के जरिए सरकार की मदद करने का बीड़ा उठा रहीं हैं।
ट्राइडेंट फाउंडेशन, ट्राइडेंट ग्रुप के तत्वावधान एक गैर-लाभकारी संगठन है जिसने बरनाला जिले के गांवों धौला, फतेहगढ़ चन्ना, संघेरा, कान्हेके, शेखा और हंडिया के इलाकों में इस दिशा में विशेष पहल की है ताकि इन क्षेत्रों को पराली जलाने की प्रथा से मुक्त किया जा सके।
ट्राइडेंट फाउंडेशन द्वारा “पराली समाधान” शीर्षक से शुरू की गई पहल के तहत, फाउंडेशन किसानों को धान के अवशेषों को जलाने के लिए एक व्यवहारिक विकल्प प्रदान कर रहा है। ट्राइडेंट फाउंडेशन ने इन गांवों के किसानों को 2000 एकड़ के कुल क्षेत्रफल पर पराली का निपटान करने वाली मशीनरी को प्रदान किया है। अब तक इन गांवों में 6000 टन पराली को उठाया जा चुका है और साथ ही खेतों की सफाई का पूरा खर्च भी ट्राइडेंट फाउंडेशन वहन करेगा।
किसानों को प्रदान की जाने वाली मशीनों में रीपर/मल्चर शामिल हैं जो पौधे के शेष भाग (स्टबल) को शून्य स्तर पर काटती हैं, मेकर मशीन इन फसल अवशेषों के ढेर बनाती है और बेलर मशीन की मदद से स्टबल इकट्ठा कर लोडिंग के लिए इनकी चौकोर या गोल गांठ बना दी जाती है। ट्राइडेंट फाउंडेशन द्वारा किसानों को बिना किसी कीमत के यह सारी मशीनरी उपलब्ध कराई जा रही हैं ।
“पराली समाधान” की इस पहल के बारे में विवरण साझा करते हुए ट्राइडेंट फाउंडेशन के प्रवक्ता ने कहा कि, “ट्राइडेंट फाउंडेशन यह सुनिश्चित करने की हमारी प्रतिबद्धता में अपना योगदान दे रहा है कि मनुष्य और प्रकृति सह-अस्तित्व में रहे और साथ साथ फले-फूलें। यह काम ट्राइडेंट फाउंडेशन ने अतीत में भी किया है और आगे भी करता रहेगा। वैज्ञानिक पहलुओं बेहतर पराली प्रबंधन प्रथाओं को अपनाने के लिए ट्राइडेंट फाउंडेशन किसानों को जागरूक करने के लिए कई प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की भी योजना बना रहा है।
ट्राइडेंट फाउंडेशन के बारे में
ट्राइडेंट फाउंडेशन, ट्राइडेंट ग्रुप के तत्वावधान में एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो 3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का समूह है जो कि कपड़ा, कागज, यार्न, रसायन और ऊर्जा में सक्रिय है। ट्राइडेंट फाउंडेशन स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला स्वास्थ्य और स्वच्छता, विविधता, समावेशी और रोजगार योग्य कौशल विकास के क्षेत्र में में कार्यक्रम चला रहा है। परोपकारी उपक्रमों के क्षेत्र में विशेषज्ञता और व्यापक ज्ञान रखने वाली सुश्री मधु गुप्ता ट्राइडेंट फाउंडेशन का नेतृत्व कर रही है।
अधिक जानकारी के लिए www.tridentfoundation.org पर संपर्क किया जा सकता है।












