Sunday, October 18, 2026
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कारगिल युद्ध के दौरान मशकोह घाटी राजऩीतिक नजऱ से काफ़ी महत्वपूर्ण थी: ब्रिगे. उमेश सिंह बावा

चंडीगढ़ (द स्टैलर न्यूज़)। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान 17 जाट यूनिट ब्रिगेडियर उमेश सिंह बावा की कमांड अधीन थी और उनकी यूनिट ने मशकोह घाटी में 4875 प्वाइंट के हिस्से पिम्पल कंपलैक्स पर कब्ज़े के दौरान अहम भूमिका निभाई थी। ब्रिगेडियर बावा ने अपनी सेवामुक्ती के बाद एक किताब ‘मशकोह: कारगिल एज़ आई सॉ इट’ लिखी।

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इस बार वर्चुअल तौर पर करवाए जा रहे मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल के चौथे भाग के उद्घाटन के दिन किताब ‘मशकोह: कारगिल एज़ आई सॉ इट’ पर विचार-विमर्श करवाया गया। इस विचार-विमर्श का संचालन एच.टी. के रैज़ीडैंट एडीटर श्री रमेश विनायक की तरफ से किया गया और अन्य भागीदारों में मेजर जनरल अमरजीत सिंह और इंडियन ऐक्सप्रैस के रैज़ीडैंट एडीटर मनराज गरेवाल शर्मा शामिल थे।

ब्रिगे. उमेश सिंह बावा द्वारा लिखी गई यह पुस्तक ‘मशकोह वारियजऱ्’ की जंगी कहानियों का प्रमाणित वृतांत है, जिन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान 17 जाट यूनिट की कमांड संभाली और जिनको 1999 में मशकोह घाटी में अपनी बहादुरी के लिए वीर चक्र के साथ सम्मानित किया गया।
श्री रमेश विनायक ने बताया कि कारगिल जंग के दौरान उन्होंने इस क्षेत्र का दौरा किया था और उस समय इंडिया टुडे के लिए रिपोर्ट की थी। उन्होंने बताया कि यह किताब इस ढंग से लिखी गई है कि यदि कोई इसको पढऩा शुरू करता है, तो इसको पूरा पढ़े बिना नहीं छोड़ता।

ब्रिगे. बावा ने बताया कि इस पुस्तक को लिखने का मुख्य उद्देश्य आने वाली पीढ़ीयों के लिए युद्ध के तजुर्बे साझा करना है ताकि जब नये युद्ध शुरू और ख़त्म हों, तो महत्वपूर्ण सबक ‘ख़ून के साथ फिर से लिखने-पढऩे की आवश्यकता न पड़े। उन्होंने कहा कि यह किताब दिखाएगी कि कारगिल युद्ध के दौरान हमने जो गलतियाँ की थीं उसे दोहराया नहीं जाना चाहिए और यह किताब दुनिया को 17 जाट के सैनिकों के बलिदानों और बहादुरी बारे बताने का एक ज़रिया है। उन्होंने यह भी बताया कि यह किताब तालाबन्दी के कारण खाली समय के दौरान लिखी गई है।

मेजर जनरल अमरजीत सिंह ने कहा कि यह किताब ब्रिगे. बावा की तरफ से लिखी गई है, जो कारगिल युद्ध के दौरान लड़ाई के मैदान में थे और जिन्होंने कारगिल जंग के दौरान गोलियों का बहादुरी के साथ सामना किया। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक वास्तव में कारगिल जंग की असली घटनाओं का पहला लिखित वृतांत है। उन्होंने कहा कि कई बार, जो लोग सैनिक इतिहास लिखते हैं, वह व्यक्तिगत तौर पर लड़ाई में शामिल नहीं होते और यह लेख असली वृतांत नहीं होते। परन्तु यह किताब इस बात सम्बन्धी असली विवरण पेश करती है कि उस दौरान मशकोह घाटी में क्या हुआ था।

मनराज ग्रेवाल शर्मा ने बताया कि इस पुस्तक में एक ऐसा अध्याय भी है जिस संबंधी युद्ध की रिपोर्ट करने वाले मीडिया को पता होना चाहिए। ब्रिगे. बावा ने कहा कि कारगिल युद्ध के दौरान बहुत से मीडिया कुछ अन्य क्षेत्रों को कवर कर रहे थे, परन्तु मशकोह घाटी अंदरूनी इलाकों में थी और रणनीतक तौर पर स्थित थी। उन्होंने बताया, ‘मशकोह घाटी में हमारी सफलता का कारण यह था कि मेरी टुकड़ी पहले ही स्थिति के अनुकूल थी क्योंकि मेरी टुकड़ी एक ऊँचाई वाले क्षेत्र में स्थित थी। इस तरह, मेरी टुकड़ी को इसका फायदा मिला और हमने दुश्मनों का बहादुरी से सामना किया।’

ब्रिगेडियर बावा ने आगे कहा कि दुश्मन तीन अलग -अलग दिशाओं से घिरा हुआ था और उनकी फौजों ने तीन अलग अलग दिशाओं से कई विकल्पों वाला एक स्थायी आधार स्थापित किया था। उन्होंने कहा, ‘पश्चिमी रास्तेे का इस्तेमाल दुश्मन को चकमा देने के लिए किया गया, जबकि सैनिकों ने वास्तव में दक्षिण और दक्षिण -पूर्वी दिशा से हमला करने का फैसला किया था। चकमा देने की इस योजना के कारण ही दुश्मन को पता नहीं लग सका कि हमला किस तरफ से हो रहा है और यह हमारे लिए काफी मददगार साबित हुआ।

मेजर जनरल अमरजीत सिंह ने कहा कि कारगिल युद्ध 16000 फुट की ऊँचाई पर लड़ा जा रहा था, जहाँ एक कदम भी उठाना बहुत मुश्किल है। उन्होंने कहा कि हम हमारे जवानों के हौसले और बहादुरी को सलाम करते हैं, जो इतनी ऊंचाई पर भी बहादुरी से लड़े और जीते भी।
 ब्रिगेडियर उमेश सिंह बावा ने यह भी बताया कि उन्होंने पुस्तक में भी इस संबंधी जिक्र किया है कि किसी भी युद्ध में निगरानी और चैकसी सबसे महत्वपूर्ण होती है और सालों से हमारी योग्यता में सुधार हुआ है और बहुत से उपकरण खरीदे गए हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर चैकसी और निगरानी रखने वाले देश को अपने विरोधी की अपेक्षा हमेशा ज्यादा फायदा होता है।

उन्होंने मीडिया पर भी अपने विचार सांझे किये कि हमारे देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुये क्या रिपोर्ट करना है और क्या नहीं। मीडिया और सेना को सैनिकों और आम नागरिकों का मनोबल ऊँचा रखने के लिए हमेशा मिल कर चलना चाहिए। गलत चीजों की रिपोर्टिंग युद्ध के खत्म होने के बाद की जानी चाहिए न कि युद्ध के दौरान।
उन्होंने आगे सांझा किया कि यह पुस्तक कारगिल के बहुत ही चुनौतीपूर्ण ऊँचाई वाले क्षेत्र में बहादुरी, हँसी-मजाक, भावनाओं, बड़े नुकसानों और कड़ी मेहनत से हासिल की विजयों के किस्सों पर प्रकाश डालती है जहाँ अधिकांश ने यह मान लिया था कि मिशन कामयाब नहीं होगा।

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