
हमारे देश के एक बहुत ही विख्यात शायर हैं, जिनका नाम है राहत इंदौरी। उनका एक वाक्य काफी प्रचलित हुआ और अकसर वह भी मंचों से उसे दोहराना नहीं भूलते। वह कहते हैं कि उन्होंने एक मुशायरे में कहा कि सरकार चोर है। अगले दिन उन्हें कई लोगों ने घेर लिया और कारण पूछने पर कि तुमने सरकार को चोर कहा है। इस पर उन्होंने कहा कि उन्होंने किसी का नाम तो लिया नहीं और न ही यह कहा कि कहां की सरकार चोर है तो इस पर रोष व्यक्त करने पहुंचे लोगों ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि कौन सी सरकार चोर है। उनकी यह कहावत हमारे द्वारा लगाई जाने वाली चुटकी के माध्यम से उजागर किए जाने वाले कई मामलों पर सटीक बैठती है। हाल ही में हमने एक सरकारी सामाजिक संस्था में हो रहे गोलमाल को उजागर करने का प्रयास किया था। उसमें हमने कदापि नहीं कहा था कि कौन सी संस्था है और कहां की है। लेकिन चोर को अपना पाला की कहावत यहां चरितार्थ हो गई और कई लोगों ने हमें एक संस्था का नाम लेकर खुद ही सच्चाई कबूल कर ली कि आखिर हो तो गलत ही रहा है। पर, रोकेगा कौन? अब इस सवाल का जवाब भी उसके पैरोकारों के पास ही होगा।

स्टैलर चुटकी
इस संबंधी सूत्रों से ताजा-ताजा मिली जानकारी अनुसार जब से यह मामला उजागर हुआ है तब से अंदर खाते हलचल इतनी है कि अपने किए पर पर्दा डालने के लिए कई लोग फिल्डिंग भी लगा चुके हैं तथा एक दिन तो ऐसा रहा कि देर सायं (लगभग रात हो चुकी थी) तक बंद कमरों में खातों की सफाई करने हेतु टीम जुटी रही ताकि दान की राशि के दुरुपयोग को सदुपयोग दिखाया जा सके। वैसे वहां कैमरे भी लगे हैं तथा यह मंज़र उनमें भी तो कैद हुआ होगा। तो ऐसे में उच्चाधिकारियों का फर्ज नहीं बनता कि वह जांच करवाएंगी कि आखिर क्या गोलमाल हुआ। अगर खाते सही होंगे तो कौन उंगली उठाएगा तथा जो उठाएगा उसकी सुनेगा कौन। चर्चा है कि उच्चाधिकारियों की छत्रछाया में फलफूल रहे इन लोगों के काले कारनामों की अगर गहनता से जांच करवाई जाए तो ही प्रमुख चेहरे बेनकाब होंगे, की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
मगर, सवाल है कि जांच करवाएगा कौन और कौन उठाएगा सवाल? भ्रष्टाचार मुक्त शासन एवं प्रशासन देने के दावे करने वाले सत्ताधारियों के पास तो इतना समय ही नहीं कि वह इतने संवेदनशील मुद्दे का संज्ञान तक ले सकें तथा अगर उनके पास समय होता तो शायद अब तक कई लोगों की कुर्सी जा चुकी होती। लेकिन यहां तो किसी सत्ताधारी ने इसकी सच्चाई का पता करने का भी प्रयास नहीं किया। जिससे आशंका जाहिर होती है कि कहीं न कहीं सत्ताधारियों के मुंह को भी खून लगा दिया गया है ताकि वह जुबान तो खोलें लेकिन उसमें से विरोध के स्वर न निकलें। इस संस्था से जुड़े एक बड़े स्तर के नेता जी ने भी इस पर कोई कार्यवाही करनी जरुरी समझी। कुछेक सदस्यों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दान के पैसे की इतनी दुर्गति उन्होंने आज तक नहीं देखी। लेकिन उच्चाधिकारी इस संबंधी सुनने को तैयार नहीं तो ऐसे में वह भी क्या करें।
पता चला है कि खुद को निर्दोश व सफेदपोश साबित करने के लिए संस्था के अधिकारियों व कथित मिलीभगत करने वाले कुछेक सदस्यों द्वारा जुगाड़ लड़ाने शुरु कर दिए गए हैं ताकि संस्था की बचीखुची साख को बट्टा लगने से बचाया जा सके। अब देखना यह होगा कि क्या कोई सदस्य इस सारे मामले से पर्दा उठाने के लिए आगे आता है या फिर भ्रष्टाचार की चक्की को चलता देख अपनी आंखे मूंद ठीक समय का इंतजार करता है। वैसे एक बात है जल्द ही लावा फूटने वाला है। क्योंकि, दान की राशि को पचाना इतना भी आसान नहीं। बुजुर्ग कहते हैं जो लोग दान की राशि का दुरुपयोग करते हैं उन्हें पानी पिलाने वाला भी कोई नहीं रहता। यह तो रहीं बुजुर्गों की बातें, जिन्हें आज कम ही लोग मानते हैं। लेकिन हमें क्या, हमने जो कहना था कह दिया, जो बताना था बता दिया। अब तो बता दूं कौन सी संस्था है और कहां की है। आप सब जानते हैं, बस सुनना मुझसे चाहते हैं। संस्था का नाम जल्द ही आपके सामने होगा, क्योंकि, खुद को साफ एवं बाशिंग पाउडर से धुला साबित करने के लिए वे लोग खुद ही आगे आने वाले हैं। हमें दे इजाजत। जय राम जी की।












