Saturday, October 17, 2026
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नेहरू ने किया धोखा, मुस्लिम लीग और जिन्ना के दबाव में वंदे मातरम का हुआ बंटवाराः PM मोदी

दिल्ली (द स्टैलर न्यूज़)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में वंदे मातरम पर चर्चा की शुरूआत की, जिसमें उन्होंनें विपक्ष को घेरा। उन्होंने वंदे मातरम को लेकर मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग के विरोध का जिक्र और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू की भूमिका पर सवाल उठाए। 

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उन्होंने कहा कि 1905 में जो वंदे मातरम महात्मा गांधी को राष्ट्र गान के रूप में दिखता था, फिर भी पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ। वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों हुआ? अन्याय क्यों हुआ? वो कौन-सी ताकत थी, जिसकी इच्छा खुद पूज्य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ गई? जिसने वंदे मातरम जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीटा गया। पीएम ने कहा, “जब वंदे मातरम के पचास वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था। जब इसके 100 साल हुए देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। तब भारत के संविधान का गला घोंट दिया गया था।” उन्होंने कहा, “इसके 150 वर्ष उस महान अध्याय को उस गौरव को पुनःस्थापित करने का अवसर है।”

पीएम मोदी ने कहा, “यह गीत ऐसे समय पर लिखा गया जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ सल्तनत बौखलाई हुई थी। भारत पर भांति-भांति का दबाव था, भांति-भांति के जुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को अंग्रेज़ों के द्वारा मजबूर किया जा रहा था।” अपने भाषण के निर्णायक हिस्से में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वंदे मातरम को विवाद में घसीटने का दोष इतिहास में दर्ज है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा विरोध किए जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम लीग के दबाव के आगे झुकते हुए वंदे मातरम की समीक्षा शुरू करवाई।

पीएम मोदी ने कहा, ‘जिन्ना के विरोध के पांच दिन बाद ही नेहरू ने पत्र लिखकर कहा कि यह गीत मुस्लिमों को भड़काता है और यहीं से इस पवित्र गीत को दो हिस्सों में बांट दिया गया।’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने इसे सामाजिक सौहार्द का नाम दिया, लेकिन वास्तव में यह तुष्टिकरण की राजनीति थी, जिसने राष्ट्र भावना को चोट पहुंचाई और अंततः भारत के विभाजन की मानसिकता को जन्म दिया।

पीएम मोदी ने बताया कि इस गीत ने सिर्फ आंदोलन नहीं जन्मा, बल्कि स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय चेतना का आधार बनाया। उन्होंने बताया कि वीर सावरकर ने लंदन के इंडिया हाउस में यह गीत गाया, भीकाजी कामा ने फ्रांस में अखबार इसी नाम से निकाला और महात्मा गांधी ने 1905 में लिखा – ‘वंदे मातरम हमारे राष्ट्रीय गीत की तरह लोकप्रिय हो गया है।’ उन्होंने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर ने भी इस गीत को भारत की एकता और बलिदान की धड़कन बताया था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रहा है, तब वंदे मातरम को नए संकल्प के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ‘हम सभी जनप्रतिनिधियों के लिए वंदे मातरम के रंग स्वीकार करने का यह पावन पर्व है। इसे सिर्फ याद नहीं, जीना होगा।’ अंत में प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को यह सच बताया जाना जरूरी है कि जिसने स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी, उसी वंदे मातरम को राजनीतिक समझौते और दबाव में विभाजित कर दिया गया।

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