
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि गुरु भगवान शिक्षा देते हैं उनका पालन करने से ही हमारी झोलियां भरती है। मनुष्य जन्म कर्म योनी है। इसलिए हमें कर्म की तरफ बहुत ध्यान देना पड़ता है। गीता कहती है कि अच्छे कर्म करो। योग कुशलतापूर्वक कर्म करना सिखलाता है। मनुष्य को भगवान ने शरीर मन और बुद्धि दी है। इससे मनुष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। इन में पांच कर्म इंद्रियां पांच ज्ञान इंद्रिया है है।

इंद्रियां अपनी मर्जी करती हैं और उनका साथ मन भी देता है। इंद्रियां कर्म करती है, मन संकल्प करता है। इंद्रियां गलत कर्म करने की सलाह देती है तो मन भी उनकी हां में हां मिला देता है। योग कहता है बुद्धि को न बिगड़ने दो। मनुष्य की जब बुद्धि बिगड़ जाती है तो सर्वनाश निश्चित है। बुद्धि को विवेक करना पड़ता है कि क्या ठीक है और क्या गलत। पशु भी समय पर सभी कर्म करते हैं। लेकिन मनुष्य के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। गीता कहती है उत्तम कर्म करो जिसका फल अच्छा हो। सबसे करीबी कर्म खाना है। अच्छा खाना खाने से सेहत बनती है और इंद्रियों के प्रभाव तथा मन के संकल्प से बड़ा खाना खाने से बीमार पड़ जाते हैं।
गीता शास्त्र है और शास्त्र प्रमाण होता है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं। एक उत्तम कर्म एक मध्यम कर्म और एक निम्न कर्म। निम्न कर्म वह जिससे इस जन्म में भी दुख मिलेगा और अगला जन्म भी बिगड़ेगा। गीता कहती है कोई कर्म करो, तीन तरीके हैं-सात्विक राजसिक और तामसिक। अगर हम सात्विक तरीके से कर्म करेंगे तो हमें मोक्ष मिलेगा। तामसिक तरीके से कर्म करेंगे तो नर्क मिलेगा। भोजन ऐसा होना चाहिए जो लंबी आयु करे, मन की शक्ति को बढ़ाए। राजसिक भोजन से बीमारियां लगती है।











