
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। भारत विकास परिषद के अध्यक्ष एवं प्रमुख समाजसेवी संज़ीव अरोड़ा के नेतृत्व में एक विशेष बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में सोशल मीडिया पर इन दिनों चर्चा में चल रहे “एक कचौरी, दो समोसा, मर्दों का क्या भरोसा” जैसे नारे पर चिंता व्यक्त करते हुए इसके सामाजिक प्रभाव पर विचार-विमर्श किया गया। सदस्यों ने कहा कि सोशल मीडिया पर कोई बात मजाक, व्यंग्य या मनोरंजन के रूप में शुरू होती है, लेकिन बार-बार दोहराए जाने से वह समाज में एक धारणा भी पैदा कर सकती है।

बैठक को संबोधित करते हुए भारत विकास परिषद के अध्यक्ष एवं प्रमुख समाजसेवी संजीव अरोड़ा ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के गलत व्यवहार की आलोचना उसके व्यक्तिगत आचरण के आधार पर होनी चाहिए, न कि उसके आधार पर पूरे पुरुष समाज को एक ही नजरिए से देखा जाए। उन्होंने कहा कि समाज में अच्छे और बुरे हर प्रकार के लोग होते हैं। यदि कोई पुरुष गलत करता है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए, लेकिन कुछ लोगों की गलतियों के लिए सभी पुरुषों को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार पुरुष अपने परिवार के लिए दिन-रात मेहनत करता है। पत्नी, बच्चों और माता-पिता की जरूरतों को पूरा करने के लिए वह कई बार अपनी इच्छाओं और सुविधाओं का त्याग करता है। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, घर का खर्च और उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए वह अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक मेहनत करता है। कई बार अपनी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने के बावजूद वह परिवार की खुशियों को प्राथमिकता देता है।
इस अवसर पर विजय अरोड़ा ने कहा कि परिवार एक-दूसरे के सहयोग और विश्वास से चलता है। जिस प्रकार महिलाओं के त्याग, संघर्ष और योगदान को सम्मान मिलना चाहिए, उसी प्रकार परिवार के लिए जिम्मेदार पुरुषों की मेहनत और भावनाओं को भी समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर किसी भी वर्ग के प्रति सामान्यीकरण करने वाले नारों को बढ़ावा देने से पहले यह सोचना चाहिए कि उनका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
अश्वनी दत्ता ने कहा कि समानता का अर्थ किसी एक वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि सभी के साथ समान दृष्टिकोण रखना है। यदि कोई पुरुष गलत करता है तो उसे उसके गलत कार्य के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और यदि कोई महिला गलत करती है तो उसके व्यवहार पर भी उसी दृष्टिकोण से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में आपसी सम्मान और विश्वास को बढ़ावा देने की जरूरत है, न कि महिला और पुरुष को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने की।
बैठक में उपस्थित सदस्यों ने कहा कि आज के समय में सोशल मीडिया समाज की सोच को प्रभावित करने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। ऐसे में हास्य और मनोरंजन के नाम पर किसी भी पूरे वर्ग के प्रति नकारात्मक धारणा पैदा करने वाले नारों को बढ़ावा देने से बचना चाहिए।भारत विकास परिषद ने कहा कि महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी परिवार के लिए ईमानदारी से जिम्मेदारियां निभाने वाले पुरुषों के योगदान को भी सम्मान देना है। कुछ गलत लोगों के कारण सभी पुरुषों को बदनाम करना न तो न्यायसंगत है और न ही स्वस्थ सामाजिक सोच का परिचायक। समाज में जरूरत पुरुष और महिला को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखने की नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयोगी और परिवार की मजबूत नींव के रूप में समझने की है।इस अवसर पर विजय अरोड़ा, अश्वनी दत्ता, मदन लाल महाजन, अजय चावला, एच. के. नाकड़ा, शाखा बग्गा, उमेश राणा, तरसेम मोदगिल, जगदीश अग्रवाल, दीपक नरूला व अन्य उपस्थित थे।












