
एक व्यक्ति या महिला को अपने नाम के आगे डाक्टर, आईएएस, आईपीएस, पीपीएस या पीईएस, इंजीनियर, प्रोफैसर, लेक्चरर व अध्यापक जैसे सम्मानिय शब्द लगाने के लिए दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है तथा सबसे मुश्किल परिस्थितयों से गुजरते हुए अपने मुकाम को पाना होता है। लेकिन एक पत्रकारिता जगत है, जिसमें मेहनत के मायने ही पूरी तरह से बदले हुए प्रतीत हो रहे हैं। आज आलम यह है कि यदि आपके पास एक मोबाइल फोन है और आप कुछ ऐसी बातों में माहिर हैं, तो आप बिना किसी डिग्री या लाइसेंस के पत्रकार बन सकते हैं तथा ऐसे पत्रकारों के समूह से आज हर कोई दुखी है, लेकिन न जाने किसी की क्या मबजूरी है कि वह इनके खिलाफ आवाज बुलंद करने का साहस नहीं जुटा पा रहे।

स्टैलर की सामाजिक चुटकी
बता दें कि अगर आपको एक समाचार पत्र शुरु करना हो तो उसके लिए लंबी चौड़ी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है तथा चैनल चलाने के लिए तो और भी अधिक। इसके अलावा नैट की बात करें तो सरकार द्वारा वैबसाइटों व समाचारपत्रों को आनलाइन कार्य की स्वीकृत्ति देने के लिए भी नियम बनाए गए हैं और जो उन नियमों को पूरा करता है वह सरकार से कार्य करने के लिए अधिकृत हो जाता है। परन्तु नियम इतने सख्त हैं कि बहुत कम लोग ही उसे पूरा कर पा रहे हैं। लेकिन फेसबुक या यूट्यूब पर चैनल बनाकर खुद को पत्रकार कहने वालों के एक से बढ़कर एक कारनामों से पत्रकारिता जगत पूरी तरह से हिल चुका है और बड़े-बड़े चैनलों एवं समाचारपत्रों को भी क्या करें क्या न करें की परिस्थिति से जूझना पड़ रहा है, मगर शायद ही किसी ने अपने कीमती समय से कुछ समय आगामी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिए निकालकर इनके खिलाफ आवाज उठाने की जहमत उठाई हो ताकि पावन एवं पवित्र पेशों की गरीमा को बनाए रखा जा सके।
तथाकथित एवं कथित झोलाछाप पत्रकारों (जो खुद को किसी भी तरह से पत्रकार कहकर संबोधित ही नहीं कर सकते), द्वारा सोशल मीडिया के नाम पर दुकानदारी चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ा जा रहा और उनका हौंसला बढ़ाने का काम वह नेता एवं प्रधान आदि व अधिकारी कर रहे हैं, जिन्हें सही और गलत से कोई मतलब नहीं, बस उन्हें तो अपने चेहरे के आगे कैमरा चाहिए। जिस प्रकार झूठी खबर होती है उसी प्रकार झूठे पत्रकार भी होते हैं, जिनकी कार्यप्रणाली का सीधा असर अधिकृत पत्रकारों के कामकाज पर पड़ रहा है। इससे पहले की कोई पत्रकार किसी समाचार को पूरी तरह से खंगाल कर जनता के सामने लाए, उससे पहले ही सोशल मीडिया के नाम पर दुकानदारियां चला रहे यह तथाकथित पत्रकार, जो पत्रकार हैं ही नहीं, के द्वारा समाचार को इस तरह से चला दिया जाता है व वायरल कर दिया जाता है कि लोगों को पता ही नहीं चलता कि समाचार की असल सच्चाई है क्या।
और तो और इन तथाकथित पत्रकारों का न तो कोई आफिस है, न कोई स्टाफ। एक मोबाइल, स्कूटर या बाइक और एक साथी ऐसा जो हर काम में बराबर का साथ दे। सुबह तैयार होकर इस प्रकार शहर, गांव या कस्बे में निकलते हैं कि इनसे बड़ा नामानिगार कोई और है ही नहीं। नेताओं और विभिन्न विभागों में टहलते हुए पारखी नज़र से कमियां खोजते हुए यह तथाकथित पत्रकारों के धक्के एक बार जो चढ़ गया तो बस फिर उसकी खैर नहीं। मांडवाली कर ली तो अच्छा है, नहीं तो पहले खुद समाचार को वायरल करते हैं और जब बात न बने तो अपने अधिकृत साथी के साथ मिलकर खबर को छापने की धमकी देकर दवाब बनाने की कवायद में रहते हैं। कुल मिलाकर कहें तो उनका एक ही लक्ष्य रहता है कि किस प्रकार सामने वाले की जेब से कुछ ऐंठा जा सके।
पत्रकारिता को प्रफुल्लित करने व अधिकृत पत्रकारों से जुड़े मामलों के हल के लिए सरकार द्वारा जिला लोक संपर्क विभाग का गठन किया गया है, जो सरकार की नीतियों एवं योजनाओं को अधिकृत माध्यमों से जनतक करने का काम करता है। इस विभाग में अगर कोई अधिकारी सख्त आ जाए, जो अनाधिकृत पत्रकारों को उनकी औकात दिखा देता है तो उसकी कार्यप्रणाली को मीडिया पर हमला बताते हुए यह तथाकथित पत्रकार अपने राजनीतिक आकाओं के दरबार में पहुंच जाते हैं और उनके माध्यम से अधिकारी पर दवाब बनाते हैं कि वह उन्हें गैरकानूनी ढंग से काम करने से न रोके। इसके बाद यह तथाकथित पत्रकार अधिकारी के सामने ऐसे ऐंठते हुए घूमते हैं कि अधिकारी भी चुप्पी साधे रहने में भलि समझता है। जिस कारण इनके हौंसले और भी बुलंद हो रहे हैं।
मुझे किसी ने कहा कि आप सोशल मीडिया को बुरा कह रहे हैं तो मैं उन्हें साफ कर देना चाहतू हूं कि बात सोशल मीडिया के नाम पर कथित पत्रकार बनकर घूम रहे उन लोगों की हो रही है, जो कहीं न कहीं आपके लिए भी किसी नासूर से कम नहीं हैं। मेरा एक ही सवाल है कि क्या मैं बिना कोई टैस्ट पास किए इंस्पैक्टर बन सकता हूं या अपने नाम को आगे डाक्टर, वकील या आईएएस लिख सकता हूं। अगर नहीं, तो फिर कोई बिना डिग्री व सरकार की मान्यता से पत्रकार कैसे बन सकता है, जबकि वह किसी अनाधिकृत संस्थान के साथ काम भी नहीं करता।
आपको एक और बार बता दें कि तथाकथित पत्रकारों का एक कारनामा हल ही में सामने आया है, जिसमें एक कथित पत्रकार ने एक समाचार लगाया और एक अधिकारी को बाट्सऐप पर भेज दिया। समाचार में उसने बिना नक्शा पास करवाए बन रही इमारतों की बात की तथा जब अधिकारी ने उसके बारे में जांच की तो पाया कि इमारतों का नक्शा पास था और वह कानूनी तौर पर कही बन रहीं थीं। लेकिन कथित पत्रकार ने बिना किसी जांच के समाचार लगाकर जहां संबंधित विभाग का अक्स खराब करने का प्रयास किया वहीं इमारत के मालिक भी इस खबर के बाद सहमे से दिखे। जबकि उन्होंने सरकारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही इमारत का काम शुरु किया था।
इसके बाद अधिकारी ने जब उससे सख्ती से पूछा की आपने समाचार गलत लगा दिया तो उसने आगे से जो कहा उसे सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे, कथित पत्रकार ने कहा कि जब आपके बंदे हमारा काम नहीं करेंगे तो हम तो मीडिया वाले हैं और हम तो ऐसे ही खबर लगाते हैं। अब आप ही सोचिए एक व्यक्ति जो खुद गैरकानूनी ढंग से पत्रकारिता के नाम पर काम करता हो और वह गलत समाचार वायरल करके दवाब बनाने का प्रयास कर रहा हो तो उसके साथ क्या किया जाना चाहिए। ऐसे कई वाक्य हैं जो मैं आपसे सांझा कर सकता हूं।
मुझे किसी ने कहा छड्डो जी असी की लैणा, कम्म करदे करी जाए, पर अब और नहीं। हमारी तरफ से आपको 2-3 स्टोरीज़ औप पढ़ने को मिलेंगी, जिसमें आपको बताएंगे कि सोशल मीडिया जहां कई मामलो में जनता का सहायक सिद्ध हो रहा है वहीं इसके नाम पर कथित दुकानदारियां चला रहे किस प्रकार लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। हमने जो कहना था कह दिया। आगे आपकी मर्जी। मुझे दें इजाजत। जय राम जी की।











