

जब से सोशल मीडिया अस्तित्व में आया है तब से एक क्रांति की तरह पत्रकारिता जगत में मानो एक सुनामी सी आ गई हो। जिसके हाथ में मोबाइल वही पत्रकार। यहां तक कि सोशल मीडिया जिस काम के लिए बनाया गया होगा, उस उद्देश्य से उल्ट आज इसका इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा है कि इस तरफ न तो सरकारों का ध्यान है और न ही पत्रकारिता जगत से जुड़े बड़े घरानों का, जो सरकार पर इन पर लगाम लगाने का दवाब बना सकते हैं। आलम यह है कि सोशल मीडिया की आड़ में तथाकथित पत्रकार, या य़ूं कहें कि झोलाछाप पत्रकारों का समूह (जिनके पास न तो पत्रकारिता की कोई डिग्री है और न ही सरकार द्वारा अधिकृत किया गया है तथा न ही वह किसी अधिकारित संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं), इस कद्र हावी हो चुका है कि क्या अधिकारी, क्या व्यापारी, क्या उद्योगपति तो क्या ठेकेदार (सिविल वर्क व शराब आदि के ठेकेदार), सभी इनके प्रकोप से बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। य़हां तक कि अधिकृत पत्रकार भी इनके ताप से अछूते नहीं।

स्टैलर की सामाजिक चुटकी
बात को ज्यादा न घुमाते हुए व पंजाब की न करते हुए होशियारपुर जिले की ही बात की जाए तो पूरे जिले में इनका जाल मकड़ी के जाल से भी सघन और मजबूत कहा जा सकता है। सफाई और रौब से काम करने में सफल इन कथित पत्रकारों का नैटवर्क इतना फैला है कि कुछेक अधिकृत पत्रकारों के आशीर्वाद एवं सांठ गांठ से इनका धंधा खूब फलफूल रहा है। होशियारपुर शहर, चब्बेवाल, मेहटीयाणा, कोट फतूही, सैलाखुर्द, गढ़शंकर, बुल्लोवाल, टांडा, हरियाना, गढ़दीवाला, दसूहा, उच्ची बस्सी, मुकेरियां, नंगल घोगरा, हाजीपुर, दातारपुर, तलवाड़ा आदि के अलावा कोई एकाध ही क्षेत्र होगा जहां इनकी जड़ें न फैली हों। लोगों को ब्लैकमेल करने में माहिर इन अनाधिकृत कथित पत्रकारों को अगर किसी की कोई गलती का पता चल जाए तो फिर सामने वाले की खैर नहीं तथा अधिकारियों पर कार्यवाही का ऐसा दवाब बनाते हैं कि सामने वाला हाथ पैर जोड़कर संधि की जब गुहार लगा उठता है, तो एक के बाद एक साथी (कथित पत्रकारों का समूह) उसे पूरी तरह से निचोड़कर आगे से भी कोपरेट करने की नसीहत दे देता है ताकि जेब में माल कम न हो।
अगर किसी के बारे में कोई खबर लगाता है और असर न हो तो ब्लैकमेलिंग का स्तर तो देखिए, फिर वह खबर किसी अधिकृत पत्रकार से एंगल बदल कर लगवा दी जाती है तथा उसके बाद शुरु होता है मांडवाली का सिलसिला। इसके बाद ब्लैकमेलर मध्यस्थता करके मामला सैटल की बात कहता है और पत्रकार को पुनः खबर न लगाने की बात कहते हुए मोटी रकम वसूल लाता है। सोशल मीडिया के माध्यम से इन अनाधिकृत पत्रकारों से अधिकारी तो अधिकारी बड़े-बड़े नेताओं के होंठों से भी इनके खिलाफ कोई बात नहीं निकल रही। जिस कारण इनके हौंसले और बुलंद हो रहे हैं।
आपको एक और बात बताता हूं कि अगर इनकी खबर (जिसे लगाने के लिए यह अधिकृत ही नहीं हैं) का असर न हो तो उसे असरदार बनाने के लिए दूसरे शहरों में बैठे तथाकथित और अनाधिकृत पत्रकारों से फोन करवाकर या खबर लगवाकर पार्टी को डराया धमकाया जाता है तथा उद्योगपति व व्यापारी व्यक्ति किसी तरह के झमेले में पड़ने से बचते हुए इनकी मनोकामना पूरी करने को विवश हो जाता है। इस तरह से इनका धंधा खूब फलफूल रहा है। इनकी नज़र इंडस्ट्री, माइनिंग, सड़कों व गलियों तथा इमारतों के निर्माण के अलावा अधिकारियों के काम में छोटी से छोटी चूक को ढूंढती रहती हैं और एक बार कोई मामला इनके ध्यान में आ जाए तो फिर उसे सार्वजनिक कर देने की धमकियां-चेतावनियां या समझौते के संदेशे संबंधित पार्टी को जाने शुरु हो जाते हैं। मरता क्या न करता वाली परिस्थिति से गुजर रहा व्यक्ति इनके शोषण का कब शिकरा हो जाता है उसे भी पता नहीं चलता। इनके दुष्प्रभावों से अधिकृत पत्रकार जगत भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है तथा उनके पास भी इसे रोकने का कोई उपाय नहीं, जिससे इन पर थोड़ी तो लगाम लग सके।
एक सीनियर पत्रकार से इस बारे में चर्चा हुई तो उनका कहना है कि यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है और इस पर सरकार को तुरंत प्रभाव से कार्यवाही करनी चाहिए। उनका कहना है कि यह हमारी आने वाली उस पीढ़ी जो पत्रकारिता में अपना भविष्य बनाने के लिए दिन रात मेहनत कर रही है, के लिए बहुत ही घातक है। क्योंकि, पत्रकारिता बहुत ही दायित्व एवं जिम्मेवारी वाला काम है और सच व झूठ को उजागर करने के साथ-साथ सामाजिक सरोकार से जुड़े मामले को बहुत ही संवेदनशील तरीके से उठाना इसकी अहम जिम्मेदारी है। एक छोटी सी गलती से कई जिंदगियों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए फोटो एवं वीडियो के शौकीन अधिकारियों एवं नेताओं को इस बारे में जरुर सोचना चाहिए तथा हरेक व्यक्ति जो खुद को पत्रकार कहकर उनसे मुखातिब होता है की सारी जानकारी उन्हें जुटानी चाहिए तथा उसका पहचानपत्र देखना चाहिए तथा जिला लोक संपर्क कार्यलय से उसकी वैद्यता की जांच जरुर करवानी चाहिए कि वह अनाधिकृत तो नहीं। इसके अलावा आम लोगों तथा कामकाजी लोगों और अधिकारियों को भी इनके प्रति कठोर रुख अपनाने की जरुरत है। अगर आपको भी फेसबुक या यूट्यूब पर चैनल बनाकर कोई खबर लगाने की धमकी देता है तो पहले उसका लाइसेंस चैक करें और जिला लोक संपर्क अधिकारी के कार्यालय से संपर्क करके उसकी जानकारी जुटाएं। इसके बाद ही उनकी मनोकामना पूरी करने की तरफ ध्यान दें। अब आप समझ ही गए होंगे कि मनोकामना किस प्रकार पूरी करनी है ताकि साहब और किसी को दवाब में लाने की हिम्मत तो दूर सपने में भी न सोच सकें। मुझे दें इजाजत, हमने जो कहना था कह दिया, अब आगे आपकी मर्जी। वैसे एक बात है जल्द ही आपको एक क्षेत्र से खबर मिलने वाली है कि कथित-तथाकथित पत्रकारों की खूब सेवा हुई और उन्होंने माफी मांगकर जान छुड़ाई। वैसे दो-तीन वाक्य हो चुके हैं जब ऐसे पत्रकारों की सेवा हुई और पुलिस के सामने उन्होंने माफी मांग जान छुड़ाई। इनमें दूसरे शहर के भी शामिल थे। जय राम जी की।











