
अमृतसर (द स्टैलर न्यूज़)। अप्रैल 1919 में जब वैसाखी का त्यौहार मनाने के लिए और आजादी के आंदोलन में भाग लेने के लिए लोग अमृतसर में इकट्ठे थे, श्री दरबार साहिब में माथा टेकने के लिए भी श्रद्धालु आए थे उसी दिन जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में देशभक्तों का, निर्दोष लोगों का संहार लिया। गोलियों से हजारों लोगों को भून दिया। मार दिया, घायल कर दिया। मेरा सरकार से यह प्रश्न है कि क्या उस दिन बैसाखी नहीं थी? जब हम जलियांवाला बाग कांड बैसाखी के दिन ही याद करते हैं तो अंग्रेजी तिथि के अनुसार 13 अप्रैल को ही क्यों मनाते हैं। इस वर्ष संक्रांति अर्थात बैसाखी 14 अप्रैल को है। इससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है, पर हमारी सरकारें 13 अप्रैल को ही जलियांवाला बाग की बरसी मनाकर अपनी ड्यूटी पूरी कर लेती हैं। सरकार याद रखे उस दिन बैसाखी थी जिस दिन यह कांड हुआ और उसका श्रद्धांजलि समारोह या शहीदों को याद करने का पवित्र कार्य भी बैसाखी को ही होना चाहिए।

आखिर हम 13 अप्रैल से क्यों बंधे हैं। सरकार चाहे जो करे लेकिन जलियांवाला बाग ट्रस्ट ने भी आंखें बंद कर ली हैं और अंग्रेजों की गुलामी करते 13 अप्रैल को ही बैसाखी मारकर शहीदी दिवस मना लेते हैं। मेरा देश की जनता से निवेदन है कि बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग के शहीदों को श्रद्धांजलि दें, मंदिरों, गुरुद्वारों में एवं अन्य सभी धार्मिक स्थलों में उनके लिए प्रार्थना करें। स्मारक पर पहुंचकर शहीदों को याद करें, पर दिन बैसाखी का होना चाहिए। हमारा शहीदी दिन और बलिदान का दिन बैसाखी है। 13 अप्रैल तो मात्र संयोग है।












