Tuesday, October 13, 2026
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98% से अधिक अंक लाने का दबाव: किशोरों पर पड़ता प्रतिकूल प्रभावः चंद्र प्रकाश

होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में शिक्षा को सफलता की सबसे बड़ी कुंजी माना जाता है। माता-पिता, शिक्षक और समाज सभी बच्चों से उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा रखते हैं। लेकिन जब यह अपेक्षा 98% या उससे अधिक अंक लाने के दबाव में बदल जाती है, तो यह किशोरों के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। अंक महत्वपूर्ण हैं, परंतु जीवन का मूल्य केवल प्रतिशत से नहीं आँका जा सकता।

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अध्यापक चंद्र प्रकाश ने विद्यार्थियों को यह सलाह देते हुए कहा है कि किशोरावस्था जीवन का वह संवेदनशील दौर है जब व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और पहचान का निर्माण होता है। इस समय यदि बच्चे पर अत्यधिक अंक लाने का दबाव डाला जाए, तो वह स्वयं को केवल अंकों के आधार पर आँकने लगता है। यदि 98% नहीं आए तो उसे लगता है कि वह असफल है। यह सोच धीरे-धीरे हीन भावना, आत्म-संदेह और अवसाद का रूप ले सकती है।

आजकल बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों के समय समाचारों और सोशल मीडिया पर 99% या 100% अंक लाने वाले विद्यार्थियों की चर्चा होती है। इससे अन्य छात्रों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनता है। माता-पिता अनजाने में तुलना करने लगते हैं—“देखो, फलाँ बच्चे ने 99% लाए हैं, तुम क्यों नहीं?” यह तुलना किशोरों के मन में तनाव और असुरक्षा को बढ़ाती है। हर बच्चा अलग होता है, उसकी क्षमता, रुचि और सीखने की गति अलग होती है।

अत्यधिक अंक लाने का दबाव बच्चों की दिनचर्या को असंतुलित कर देता है। वे खेलकूद, संगीत, कला और सामाजिक गतिविधियों से दूर हो जाते हैं। उनकी पूरी ऊर्जा केवल पढ़ाई और कोचिंग तक सीमित हो जाती है। परिणामस्वरूप उनका समग्र विकास बाधित होता है। शारीरिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है—नींद की कमी, सिरदर्द, आँखों में दर्द और थकान आम हो जाते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव और भी गंभीर है। लगातार पढ़ाई और अपेक्षाओं का बोझ चिंता (एंग्जायटी) और अवसाद को जन्म देता है। कई बार बच्चे असफलता के डर से परीक्षा के दौरान घबराहट, पसीना आना, हाथ काँपना जैसी समस्याओं से गुजरते हैं। कुछ मामलों में तो आत्महत्या जैसे दुखद कदम भी देखने को मिलते हैं, जो समाज के लिए चेतावनी है कि हम बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालें।

किशोरों के संबंधों पर भी इसका असर पड़ता है। वे मित्रों से दूरी बना लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि समय व्यर्थ न हो। परिवार के साथ संवाद कम हो जाता है। यदि परिणाम अपेक्षा के अनुरूप न आएँ तो घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। इससे बच्चे भावनात्मक रूप से अकेला महसूस करते हैं।

यह समझना आवश्यक है कि अंक केवल शैक्षणिक प्रदर्शन का एक मापदंड हैं, जीवन की सफलता का अंतिम सत्य नहीं। इतिहास गवाह है कि अनेक सफल व्यक्तियों ने विद्यालय में औसत अंक प्राप्त किए, परंतु अपनी रुचि, मेहनत और नवाचार से उन्होंने असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कीं। सफलता बहुआयामी है—रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता, नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक कौशल का भी उतना ही महत्व है।

माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए, न कि केवल परिणाम पर ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा मेहनत कर रहा है, तो उसके प्रयास की सराहना होनी चाहिए। तुलना करने के बजाय उसकी प्रगति पर ध्यान देना चाहिए। खुला संवाद बनाए रखना आवश्यक है, ताकि बच्चा अपनी चिंताओं और भय को साझा कर सके।

विद्यालयों को भी परीक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर समग्र शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। खेल, कला, वाद-विवाद, सामुदायिक सेवा और जीवन कौशल शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे स्वयं को केवल अंकों तक सीमित नहीं समझेंगे।

किशोरों को भी यह सीखने की आवश्यकता है कि असफलता अंत नहीं है, बल्कि सीखने का अवसर है। उन्हें समय प्रबंधन, विश्राम तकनीक और सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए। योग और ध्यान जैसी गतिविधियाँ मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं।

अंततः, हमें यह स्वीकार करना होगा कि 98% या 100% अंक जीवन की गारंटी नहीं हैं। असली सफलता एक संतुलित, खुश और स्वस्थ जीवन जीने में है। यदि हम बच्चों को केवल अंक मशीन बना देंगे, तो हम उनकी रचनात्मकता और खुशियों को छीन लेंगे। समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जहाँ बच्चे बिना भय के सीख सकें और अपने सपनों को साकार कर सकें।

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