Tuesday, September 29, 2026
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गुरु ही शिष्य को धर्म और योग के आधार से जोड़ते हैं: आचार्य चंद्र मोहन

होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। सांसारिक संबंधों से ज्यादा गुरु से बनाया गया संबंध लाभदायक होता है क्योंकि यह स्वाभाविक तौर पर नहीं होता इसके लिए प्रयास करना पड़ता है। उक्त बात योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन ने कही। उन्होंने कहा कि गुरु अपने शिष्य को धर्म के आधार से जोड़ते हैं। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि धर्म का आधार ही योग है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को योग की शिक्षा दी। बिना आधार के कोई चीज नहीं होती। नींव पर ही कोई भवन खड़ा होता है। धर्म आत्म कल्याण का साधन है। कई तपस्वी तथा कर्मकांडी भी आत्म कल्याण का लक्ष्य नहीं रखते। इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वह योगी बने। आत्म कल्याण का पहला आधार शरीर है। अगर धर्म करना है तो पहले शरीर आएगा। मानव शरीर विशेष कर आत्म कल्याण के लिए ही मिला है।

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उन्होंने कहा कि योग द्वारा हमें अपने शरीर को स्वस्थ रखना है इसके लिए योग के साधन दिए गए हैं। क्योंकि जब शरीर रोगी होता है तो फिर हम आत्मा के बारे में नहीं सोचते। शरीर को ठीक रखने के लोिए आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार तथा मुद्राएं बताई गई है। हम योग के साधन करना तो चाहते हैं लेकिन आलस में नहीं कर पाते। समय पड़ने पर हम संशय करने लगते हैं जिसको की गुरु ही दूर कर सकते हैं। गुरु कहता है कि शरीर के साथ-साथ मन को दृढ़ और साफ रखो। मन की दृढ़ता बहुत जरूरी है। क्योंकि यह पानी की तरह बह जाता है। जिधर ढलान होती है उधर पानी बहता है। मन भी संसार में आकर जिधर प्रलोभन होता है उधर चला जाता है।परंतु जेसे प्रयास से अगर पानी जम सकता है तो फिर मन भी एक स्थान पर टिक सकता है। योगी गुरु के पास जाओ वह जब मन को अपने पास लगा लेंगे तो मन अपने आप ही दृढ़ हो जाएगा। आत्म कल्याण के लिए भगवान ने बुद्धि भी दी है। बुद्धि के अंदर भ्रांतियां आती हैं। अगर मन दृढ़ हो तो बुद्धि भी दृढ़ हो जाती है। मन तथा बुद्धि अगर भगवान के चरणों में लग जाए तो आत्म कल्याण स्वाभाविक ही है। उन्होंने कहा कि हवा की तरह ब्रह्म भी हमें दिखाई नहीं देता।वायु आकाश आदि के अलावा एक छठा तत्व भी है जो ज्ञान शक्ति है। गीता में भगवान कहते हैं कि मेरा ही अंश सब के अंदर है। उन्होंने प्राणायाम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राण नाडियो का मन से गहरा संबंध होता है। नाड़ीशुद्धी प्राणायाम को सर्वोत्तम बताते हुए उन्होंने कहा कि इस के लिए हम कुंभक की मात्रा बढ़ाएं। लेकिन इसके लिए निरंतर अभ्यास करना होगा।

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