
होशियारपुर में एक साहिब मंत्री क्या बने, उनका भाई, भतीजा और भाणजा बनने की जैसे होड़ लग गई हो। सरकारी विभागों में भी काफी चर्चा है कि सिफारिशों के लिए आने वाले अधिकत्तर फोन पर आगे से बात करने वाला व्यक्ति अपने आप को मंत्री जी का भतीजा, भाई या भाणजा ही बताता है। हालांकि यह बात मंत्री जी के लिए भी खासी सिरदर्द बनी हुई है कि आखिर तथाकथित भाई, भतीजों और भाणजों का करें क्या। इतना ही नहीं पिछले कुछ समय पहले एक नकली भाणजें को एक विभाग में फोन करना उस समय महंगा पड़ा, जब इस बात का पता असली भाणजे को लगने पर नकली भाणजे की दरोगा जी से खूब खातिर भी करवाई।

लालाजी स्टैलर की राजनीतिक चुटकी
इसी तरह एक दिन एक व्यक्ति ने खुद को मंत्री साहिब का भजीता बताकर सरकारी विभाग के एक इंजीनियर को फोन किया और अपने किसी चहेते द्वारा किए किसी गैरकानूनी काम को जायज ठहराते हुए उसे जुर्माना न करने की नसीहत दे डाली। इस भतीजे ने पहले भी एक विभाग के कर्मी को तबदील तक करवा देने की हेंकड़ी दिखा डाली थी। हालांकि बाद में मामला किसी तरह सैटल हो गया था। परंतु शहर में इस तरह की चर्चाओं का बाजार काफी समय से गर्म है।
भजीते और भाणजे ही नहीं साहिब के मंत्री बनने के बाद रातो-रात पैदा हुए कई भाई भी सरकारी विभागों में अपना रुतवा दिखाने से गुरेज नहीं करते तथा सरकारी सुखों का खूब आनंद भी ले रहे हैं तथा फिर चाहे वो बॉडीगार्ड लेकर वी.वी.आई.पी. बनने का मामला क्यों न हो। सूत्रों की माने तो कई भाई, भजीते और भाणजों के बारे में तो मंत्री जी को जानकारी कम ही है तथा ऐसे लोगों के बारे में जब उन्हें पता चलता है तो वे उसे अपने से दूरी बनाए रखने की नसीहत दे डालते है। मगर बावजूद इसके सत्ता सुख के लोभी कई बेशर्म लोग ऐसे हैं कि किसी न किसी बहाने खुद को मंत्री जी का करीबी रिश्तेदार बताकर जनता व सरकारी विभागों में अपनी रौब डालने से परहेज नहीं करते।
ऐसे लोग पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के लिए भी खासे परेशानी बने हुए हैं कि आखिर इनका क्या किया जाए, क्योंकि अधिकतर पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को छोटे-छोटे काम के लिए दो-चार होने को मजबूर होना पड़ रहा है।
आम जनता व कई सरकारी विभागों के अधिकारियों व कर्मियों में भी इस बात को लेकर असमंजस बना हुआ है कि आखिर वे किसी बात माने और किसे करें इग्नौर? कहीं इग्नौर करना महंगा न पड़ जाए।
राजनीतिक माहिरों की माने तो इस तरह के तथाकथित रिश्तेदार नईया पार लगाने नहीं बल्कि डुबोने में अधिक व महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। बाकी समझदार के लिए इशारा ही काफी होता है। यह भी सत्य है कि अकसर सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसे रिश्तेदारों के रंग बदलते देर नहीं लगती तथा वह नया आका व नया रिश्तेदार खोज कर अपने मनोरथ सिद्धी में जुट जाते हैं। इसलिए राजनीति माहिरों के अनुसार समय रहते ही ऐसे लोगों पर नकेल कस लेनी चाहिए ताकि वे नाव में छेद न कर सकें।












