
हमीरपुर (द स्टैलर न्यूज़), रजनीश शर्मा: ‘जल है तो कल है’- सामान्य मानव जीवन में अक्सर सभी इन पंक्तियों को सुनते-पढ़ते आए हैं तथा इसके भावार्थ को भी अच्छे तरीके से समझते हैं। लेकिन ज्ञान होने के बावजूद लोग जल को व्यर्थ में बहाने से बाज नहीं आते, यह जानने के बावजूद कि जल के बिना कल की कल्पना करना असंभव है क्योंकि जल ही इस पृथ्वी पर संजीवों के जीवन का आधार है। जीवन के सभी कार्यों का निष्पादन करने के लिए जल की आवश्यकता होती है। प्राकृतिक जल स्रोतों का प्राकृतिक रूप से विशेष महत्त्व है, जिसे हमारे पूर्वज भली-भांति जानते थे। लेकिन आज के लोगों की इन प्राकृतिक जल स्रोतों के प्रति प्रवृत्ति बिल्कुल ही असंवेदनशील हो गई है। पहले व्यक्ति की दिनचर्या इन्हीं प्राकृतिक जल स्त्रोतों के जल के साथ पूजा करके प्रारंभ होती थी।

साथ में ही सभी एक साथ मिलकर प्राकृतिक जल स्त्रोतों से जल लेने जाते थे तथा वहां की सफाई भी करते थे, जिससे प्राकृतिक संतुलन भी बरकरार रहता था। लेकिन आज के लोग सुबह पानी लाना तो छोड़ो, नल में आए पानी को भर लें, वही बहुत बड़ी बात है। कहीं न कहीं प्राकृतिक जल स्रोतों के विलुप्त होने के पीछे आमजन का ही हाथ है और साथ में प्रशासन की अनदेखी भी इनकी विलुप्तता को और बढ़ावा देती है। आप देखते होंगे कि जब आप छोटे-छोटे थे, तो उस समय कितने जल स्त्रोत आसपास होते थे तथा वहां से जल लाने का भी अपना ही एक अलग उत्साह होता था। लेकिन समय के साथ-साथ ये सब विलुप्त होते जा रहे हैं, जिनको विलुप्तता से बचाना आमजन यानी हम और आपकी नैतिक जिम्मेदारी है।
अगर हम हिमाचल की बात करें, तो यहां भी प्राकृतिक जल स्रोत सूखते जा रहे हैं। एक समय ऐसा था, जब हिमाचल में पर्याप्त संख्या में प्राकृतिक जल स्रोत हुआ करते थे तथा उनकी देखभाल भी सही ढंग से हुआ करती थी। लेकिन आज स्थिति भयंकर हो गई है तथा अधिकतर जल स्रोत सूख गए हैं। जो बाकी बचे प्राकृतिक जल स्रोत हैं, उनकी देखभाल भी सही ढंग से नहीं हो रही है। इस कारण ऐसी स्थिति जल्द आने वाली है, जब हिमाचल जैसे पानी वाले राज्य को भी प्राकृतिक जल स्रोतों के अभाव में भीषण संकट का सामना करना पड़ेगा।
खातरियों के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरे का बादल वहीं अगर खातरियों की बात की जाए तो विशेष तौर पर बमसन क्षेत्र में पहले प्रत्येक घर की जरूरत थी लेकिन अब इसके अस्तित्व पर खतरे का बादल मंडरा रहा है। बता दें कि सरकार द्वारा जनप्रतिनिधियों के माध्यम से जनहित में कई लाभकारी योजनाएं चलाई गई है परंतु उस फंड का उपयोग करने के लिए इस ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है, जिस कारण खातरियों का अस्तित्व समाप्त होते जा रहा है। अब तो निजी खातरियों की बात कौन ही कहे सार्वजनिक खातरियों तक की सफाई नहीं की जाती है। मनरेगा द्वारा बनी खातरियों की जागरूकता के अभाव में लोग आसपास कचड़ा फेंक देते है, जो हवा के झोंकों से उड़ कर खातरियों में चला जाता है। इसके अलावा जिनकी निजी खातरियां हैं वे इन खातरियों में नल का पानी स्टोर कर रहे हैं। नल का पानी स्टोर करने से खातरियों में बदबू के साथ साथ कीड़े भी पनप रहे हैं, जिससे बिमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
अब जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, वैसे वैसे कई हिस्सों में पानी की समस्या विकराल रूप धारण कर रही है। प्रतिवर्ष यह समस्या पहले के मुकाबले और बढ़ती जा रही है। जहां लोगों को मुश्किल से पानी मिलता है, वहां लोग जल की महत्ता को समझ रहे हैं, लेकिन जिसे बिना किसी परेशानी के जल मिल रहा है, वे ही बेपरवाह नजर आ रहे हैं।












