
अमृतसर (द स्टैलर न्यूज़)। भाजपा की वरिष्ठ नेत्री एवं पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांता चावला ने कहा है कि पंजाब ही संभवत: उत्तर भारत का एक ऐसा प्रांत है जहां की सरकारें संस्कृत को समाप्त करने के लिए पूरी तरह प्रयासरत हैं। 1997 से 2002 के मध्य स्कूलों में आठवीं तक संस्कृत और हिंदी पढ़ने वाले बच्चों के अंक जिस विषय में ज्यादा होते थे वही उनके परीक्षा परिणाम में जोड़ दिए जाते थे।

शिक्षा मंत्री तोता सिंह जी ने इसे बंद करवाया, जिसे हमने लंबे संघर्ष के बाद पुन: शुरू करवा लिया। तब स्कूल प्रबंधकों का भी इसमें बड़ा सहयोग रहा। इसके बाद अमरिंदर सिंह सरकार ने स्कूलों से संस्कृत पूरी तरह बंद कर दी और न जाने क्यों सभी शिक्षण संस्थान इस पर खामोश रहे। अब हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, केरल से लेकर हरियाणा तक सभी प्रांत संस्कृत की शिक्षा दे रहे हैं, लेकिन पंजाब में संस्कृत विषय के रूप में बंद कर दिया। जब स्कूलों में बंद हो गया तो कालेजों में बच्चे कैसे संस्कृत पढ़ पाएंगे? संस्कृत से दूर अर्थात अपनी संस्कृति और अपने सारे वैदिक, पौराणिक इतिहास से दूर।
पंजाब सरकार क्या जानती है कि श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने भी कुछ संतों को वाराणसी में संस्कृत के अध्ययन के लिए भेजा था, जो बाद में निर्मले संत के रूप में प्रसिद्ध हुए। मेरा पंजाब सरकार से और पंजाब की विशेषकर डीएवी, खालसा, सनातन धर्म तथा अन्य शिक्षा देने वाली संस्थाओं से यह आग्रह है कि वे संस्कृत शिक्षा को पुन: स्कूलों में ऐच्छिक या आवश्यक विषय बनाएं। भारत सरकार देखे कि सीबीएसई में संस्कृत आवश्यक विषय क्यों नहीं।
यह देश का दुर्भाग्य है कि गुलामी की भाषा अंग्रेजी पूरे देश में आवश्यक विषय है, पर गौरव की भाषा संस्कृत पंजाब में पूरी तरह नकार दी गई है।












