
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़): योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि जो अपने सदगुरु के साथ संबंध जोड़ लेता है वह भवसागर से पार हो जाता है। जो दुनिया के साथ ही संबंध रखता है वह आवागमन के चक्कर में बना रहता है। सदगुरु हमारा लोक और परलोक दोनों सुधार देते हैं। संसार के संबंधों में अपना स्वार्थ होता है। गुरु के अंदर कोई स्वार्थ नहीं होता वह हमारे परमार्थ का ध्यान रखते हैं।

भगवान भी जब संसार में आए तो गुरु रूप में आए। भगवान शंकर आदिनाथ है उन्होंने योग की शिक्षा दी। भगवान कृष्ण ने भी अर्जुन को योग का संदेश दिया जिसे संसार भूल चुका था। उन्होंने कहा कि योग ही धर्म है। योग के अंदर जो लिखा है वह धर्म है उसमें कोई ऐसी बात नहीं है जो धर्म अनुसार ना हो। फिर हजारों सालों बाद प्रभु रामलाल जी आए उन्होंने हमें योग पर चलने की शिक्षा दी हमें रास्ता दिखाया। भगवान कृष्ण ने गीता में कर्म योग राजयोग तथा भक्ति योग की शिक्षा दी। प्रभु रामलाल जी ने हठयोग और राजयोग की शिक्षा दी। राजयोग हमारे मन के लिए होता है और हठयोग हमारे शरीर के लिए होता है। दोनों में पहली चीज शुद्धता है। जो शुद्धि की तरफ ध्यान नहीं देगा उसे योग का कुछ भी पता नहीं चलेगा। मन शुद्ध होगा तो स्वस्थ रहेगा। इसी तरह शरीर शुद्ध होगा तो वह भी स्वस्थ रहेगा।
हठयोग कहता है षट्कर्म करो। वेद कहते हैं कि शरीर का सफर कम से कम 100 साल का है। उन्होंने कहा कि शरीर को शुद्ध रखने के लिए पेट की शुद्धि बहुत जरूरी है। अधिकतर रोग पेट से ही पैदा होते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा मस्तक ठंडा और पैर गर्म होने चाहिए। इसके अलावा पेट नरम होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कपाट दंत धोती भी महत्वपूर्ण है इससे सिर की अंदर से सफाई हो जाती है। गले के कॉक को भी साफ करना चाहिए। नेति आदि करने से आंखों की रोशनी भी ठीक रहती है।












