Monday, October 19, 2026
Home Hoshiarpur दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के गौतम नगर आश्रम में विजयदशमी पर विशेष...

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के गौतम नगर आश्रम में विजयदशमी पर विशेष सत्संग

होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) के स्थानीय आश्रम गौतम नगर में विजयदशमी के पावन पर्व के उपलक्ष्य में एक विशेष और भव्य साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आध्यात्मिक समारोह में संस्थान के संस्थापक एवं संचालक सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री  रेणु भारती जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए विजयादशमी के गूढ़, दार्शनिक और सांस्कृतिक रहस्यों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना की पुनरावृत्ति मात्र नहीं है, बल्कि यह इस महान सत्य का द्योतक है कि सत्य, धर्म और उच्च मानवीय मूल्यों की हमेशा विजय होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का वध किया था, तब वह केवल एक बाह्य योद्धा का अंत नहीं था, बल्कि वह अधर्म, अहंकार और पाशविक वृत्तियाँ के साम्राज्य का पूर्ण विध्वंस था।

Advertisements

शास्त्रों में वर्णित रावण के दस सिर इस बात के प्रतीक हैं कि मनुष्य के भीतर किस प्रकार अनेक प्रकार की नकारात्मक प्रवृत्तियां जड़ जमाए बैठी हैं। ये दस विकृतियां—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मत्सर, मद, आलस्य, हिंसा और संशय—मनुष्य की आत्मिक ऊर्जा का लगातार क्षय करती हैं। साध्वी जी ने एक बहुत ही सुंदर और प्रासंगिक प्रसंग के माध्यम से समझाया कि जिस प्रकार एक वैद्य किसी रोग के बाहरी लक्षणों का उपचार करने के बजाय उसकी मूल जड़ पर प्रहार करता है, उसी प्रकार जीवन की समस्याओं का समाधान भी बाहरी स्तर पर नहीं बल्कि आंतरिक चेतना के स्तर पर होना चाहिए। जब तक मनुष्य अपने भीतर छिपे इन दस विकारों का आत्म-विश्लेषण कर उनका दहन नहीं करता, तब तक केवल कागजी या पुतलों के रावण जलाने से आंतरिक परिवर्तन की कल्पना करना व्यर्थ है।

वर्तमान समय में इस पावन पर्व की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है। आज का आधुनिक मानव भौतिक प्रगति की दौड़ में आगे निकल चुका है, परंतु आंतरिक शांति, मानसिक संतुलन और संतोष उससे कोसों दूर होता जा रहा है। चारों ओर तनाव, वैचारिक द्वंद्व और बिखराव का वातावरण है क्योंकि मनुष्य अपनी समस्याओं का समाधान बाहर खोज रहा है, जबकि उनका मूल स्रोत उसके अपने भीतर स्थित है। इस आंतरिक अराजकता और वैचारिक उथल-पुथल से उबरने के लिए केवल बौद्धिक तर्कों या सतही नैतिक उपदेशों से काम नहीं चल सकता, इसके लिए एक शाश्वत और व्यावहारिक आध्यात्मिक पद्धति की आवश्यकता होती है। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के असीम अनुकंपा और दिव्य मार्गदर्शन में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आज संपूर्ण विश्व में ब्रह्मज्ञान की प्राचीन और प्रामाणिक दीक्षा प्रदान कर रहा है।

ब्रह्मज्ञान वह आंतरिक चक्षु और दिव्य प्रकाश है, जो मनुष्य को उसकी अपनी मूल आध्यात्मिक सत्ता से जोड़ता है। जब साधक को पूर्ण गुरु द्वारा यह दिव्य अनुभव प्राप्त होता है, तो उसके अंतःकरण में ज्ञान का ऐसा सूर्य उदय होता है जिसके तीव्र प्रकाश में काम, क्रोध, अहंकार और अन्य समस्त दुर्गुण स्वतः ही भस्म होने लगते हैं। आंतरिक चेतना का यह जागरण ही वह वास्तविक अस्त्र है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के रावण पर विजय प्राप्त कर सकता है। जब प्रत्येक व्यक्ति के भीतर से दुर्गुणों का शमन होता है, तभी एक स्वस्थ, शांत और समरस समाज की नींव रखी जाती है। यही विजयादशमी का वास्तविक संदेश है, जो हमें बाहरी आडंबरों से परे हटकर आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here