
(Editor’s Opinion) होशियारपुर, 31 अगस्त: कहते हैं जो दुनिया से चला जाए उसकी बुराई नहीं बल्कि अच्छी बातों को याद किया जाता है, मगर जाने वाले पर राजनीति करने व स्वार्थ हित दूसरों पर मिथ्य आरोप लगाने वालों की करनी कभी-कभी नासूर बन जाती है। इस बात से हम सभी भलिभांती परिचित हैं। कुछ ऐसा ही वाक्या गत दिवस होशियारपुर में भी हुआ। जब एक परिवार के नौजवान बेटे की हत्या कर दी गई और उसका शव खुर्द-बुर्द करने के लिए पहाड़ी इलाके में फेंक दिया गया और इस मामले को लेकर छोटे से लेकर महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों की भूमिका पर आज तक सवाल उठाए जा रहे हैं, जो शायद उनके लिए भविष्य की संभावित घटनाओं के लिए एक सबक साबित हो सकते हैं। मकसद सभी का एक ही था कि पीडि़त परिवार को इंसाफ मिले व भट्टी के हत्यारे सलाखों के पीछे हों। मगर इस मामले में अंदरखाते निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु व मामले की आड़ में आपसी रजिश निकालने की जो राजनीति हुई उसे किसी भी सूरत में तर्कसंगत व सामाजिक हित में नहीं ठहराया जा सकता।
होशियारपुर पुलिस को 15 अगस्त 2015 को ऊना रोड से एक शव मिला था। जिसकी पहचान सुखदेव भट्टी के नाम से हुई थी। हालांकि बाद में पुलिस ने मामले की जांच करते हुए मात्र 4 दिन में ही हत्या करने वाले 2 आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया था। मगर शव मिलने के बाद इससे पहले कि पुलिस अपनी छानबीन शुरू कर पाती इसे राजनीतिक रंगत देने में जहां लोकल लीडरशिप का हाथ रहा वहीं एस.सी. कमिशन भारत सरकार के उपचेयरमैन डा. राज कुमार वेरका द्वारा निभाई गई भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए। पुलिस को जब भट्टी का शव मिला उस समय पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई और भट्टी के परिजन व उसके परिचित सिविल अस्पताल में जुटने शुरू हो गए। इससे पहले कि पुलिस अपना काम शुरू करती गुटों में बंटी भाजपा के एक गुट के साथ-साथ कांग्रेस पक्षी कुछ लोगों ने भाजपा के दूसरे गुट से जुड़े कुछ समर्थकों जिनपर शंका जताई जा रही थी पर मामला दर्जकरने की मांग शुरू कर दी। इसका नतीजा यह हुआ कि पुलिस असमंजस में आ गई कि क्या करे क्या न करे। मगर जिनका बेटा गया था उनसे दर्द बांटने की कोशिशें कम व मामले को राजनीतिक रंगत देने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाने वालों के चेहरे ज्यादा दिखाई दे रहे थे। 16 अगस्त को भट्टी मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर भी जो रोष प्रदर्शन किया गया था वहां भी अधिक से अधिक लोगों के नाम केस में शामिल करने वालों की आवाज अधिक बुलंद दिखाई दे रही थी। जबकि पुलिस यह आश्वासन देती नहीं थक रही थी कि उसे जांच का समय दिया जाए, जल्द ही आरोपी पुलिस गिरफ्त में होंगे। इसी बीच मामले की गूंज डा. वेरका तक पहुंची और उन्होंने पुलिस को यह निर्देश दिए कि वे 16 अगस्त सायं 4 बजे तक होशियारपुर पहुंच रहे हैं तथा उससे पहले मामला दर्ज हो जाना चाहिए। पुलिस को हाथ-पैरों की पड़ गई और उसने में आनन-फानन में सात लोगों पर केस दर्ज कर दिया। शाम के समय जब डा. वेरका होशियारपुर के लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह पहुंचे तो उन्होंने इस बात की पुष्टि खुद भी की थी कि उन्होंने पुलिस को मामला दर्ज करने के निर्देश जारी किए थे तथा अकाली-भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए दलितों पर बढ़ते अत्याचारों की बात भी कही थी। मगर वे इस बात को पूरी तरह से टाल गए थे कि आखिर वे इस केस में इतनी रुची क्यों ले रहे हैं। यह बात बाद में सामने आई कि डा. वेरका मृतक भट्टी के नजदीकी परिचितों (रिश्तेदारी) में से थे और क्योंकि वे कांग्रेस पक्षी हैं तो उन्हें मामले में अकाली-भाजपा पर भड़ास निकालने का मौका मिल गया था। इसमें यह सवाल खड़ा होता है कि इतने महत्वपूर्ण पद पर आसीन डा. वेरका ने पुलिस को इतने संगीन मामले की जांच करने का समय देना भी जरूरी नहीं समझाा और मामला दर्ज करने के निर्देश दे डाले। इससे पहले भी डा. वेरका होशियारपुर में उस समय चर्चा में आए थे जब डी.ए.वी. कालेज ऑफ एजुकेशन की छात्राओं की फीस व डोनेशन से जुड़ा मामला उनके ध्यान में आया था और उन्होंने जिला अधिकारियों से रिपोर्ट तलब की थी पर उस मामले में क्या हुआ था इससे होशियारपुर निवासी, छात्राएं व मामले से जुड़े लोग अच्छी तरह से वाकिफ हैं। जिसके चलते छात्राओं के मन में डा. वेरका के प्रति आज तक रोष की लहर आज तक व्याप्त है। मगर उक्त मामले में डा. वेरका की भूमिका पर सवाल उठने स्वभाविक सी बात है, क्योंकि पुलिस ने मामले की तह तक जांच करते हुए उन 2 आरोपियों को गिरफ्तार किया जिनका एफ.आई.आर. में जिक्र तक नहीं था और आनन-फानन में जिन सात लोगों पर केस दर्ज हुआ उनके समक्ष खुद को बेगुनाह साबित करने की औपचारिकताएं खड़ी हो गईं। वेरका के निर्देशों से जहां कथित तौर पर निर्दोष लोगों पर एफ.आई.आर. दर्ज हुई वहीं पुलिस का समय भी खराब हुआ। मगर डा. वेरका द्वारा सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों पर शक के आधार पर तुरंत कार्रवाई के निर्देश जारी किए जाने से साफ जाहिर है कि कहीं न कहीं डा. वेरका अपने पद का प्रयोग कांग्रेस की हवा मजबूत करने मेंकरने से परहेज नहीं कर रहे तथा हाल ही में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की रैली में उनका पहुंचना (भले ही वे देरी से पहुंचे थे) भी इस बात की तरफ इशारा करता है कि अकाली-भाजपा को डाऊन करने की नीति के तहत वे ऐसा कोई मामला नहीं छोडऩा चाहते जिससे कि अकाली-भाजपा की स्थिति डाउन होती हो। मगर यह तो भविष्य ही बताएगा कि ऊंट किस करवट बैठने वाला है, मगर फिलहाल होशियारपुर में डा. वेरका की उक्त मामले में निभाई गई भूमिका को लेकर काफी सवाल खड़े हो रहे हैं तथा राजनीति गलियारों में भी इसकी गूंज पूरी है।












