चर्चा: राहुल के स्वागत में 3-4 चेहरे बने चर्चा का विषय, कई नाराज़

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कांग्रेस की तरफ से लोकसभा हल्का होशियारपुर से प्रत्याशी डा. राज कुमार के पक्ष में 13 मई दिन सोमवार को की गई रैली की सफलता ने जहां राजनीतिक गलियारों में काफी गर्माहट पैदा कर दी है वहीं रैली में आए राहुल गांधी का स्वागत करने पुलिस लाइल में बनाए गए हैलीपैड पर पहुंचे कांग्रेसी नेताओं में शामिल कुछ चेहरों को लेकर चर्चा का बाजार पूरी तरह से गर्म है। चर्चा है कि राहुल गांधी का स्वागत करने पहुंचे नेताओं में 3-4 तो ऐसे थे जो पूरी तरह से सिफारिशी थे और पार्टी के प्रति उनका योगदान कितना है इसका अंदाजा शायद उन नेताओं को भी भलीभांति है जिन्होंने इनकी सिफारिश की होगी। राहुल गांधी का स्वागत उनके द्वारा किए जाने संबंधी पता चलने पर कई कांग्रेसी नेताओं व कार्यकर्ताओं के चेहरों पर मायूसी छा गई।

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उनका कहना है कि रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए, कुर्सियां लगवाने के लिए, घर-घर एवं गांव-गांव जाकर लोगों को पार्टी के प्रति लामबंद करने जैसे काम उन्हें सौंप दिए जाते हैं और जब पार्टी से सम्मान पाने या किसी बड़े नेता से मिलने का अवसर आता है तो बड़े नेताओं द्वारा अपने चंद ऐसे चहेतों को आगे कर दिया जाता है, जो शायद प्रत्याशी को अपने घर की भी वोटें न डलवा सकते हों।

चर्चा है कि स्वागत करने पहुंचे नेताओं में 3-4 चेहरे ऐसे थे जिन्हें पार्टी का कार्य करते हुए कम ही देखा गया, मगर जी हुजुरी करने में माहिर और पूंजीपति होने के कारण उन्हें यह अवसर प्रदान किया गया होगा। इतना ही नहीं इनमें एक चेहरा तो ऐसा था जो कांग्रेस की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा के नेताओं के साथ भी काफी देखा जाता है और हाल ही में एक कार्यक्रम में भाजपा से संबंधित नेताओं ने उनकी तारीफ के काफी पुल भी बांधे थे। पार्टी सूत्रों के अनुसार नाराज नेताओं एवं कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर ऐसे चेहरों को ही आगे करना है तो फिर वोट मांगने भी इन्हें भी भेज देना चाहिए। ऐसे चेहरों को देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो सारे कार्यक्रम की रुपरेखा कार्यकर्ताओं एवं वरिष्ट नेताओं को नाराज करने के लिए ही रची गई हो।चर्चा यह भी है कि इस बात से नाराज कई कांग्रेसी इस बात को लेकर पार्टी हाईकमान के समक्ष भी यह मामला उठाने वाले हैं। सूत्रों की माने तो इस चर्चा की तपिश बड़े नेताओं के दरबार तक भी पहुंच चुकी है तथा अब मामले पर पर्दा डालने के लिए लीपापोती की जाने के प्रयास भी शुरु हो चुके हैं।

राजनीतिक माहिरों की माने तो चुनाव के समय नेताओं के साथ इन सिफारिशियों को भेजने के स्थान पर पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को भेजा गया होता तो वे और भी जोश से पार्टी के लिए काम करते, मगर इन चेहरों से उनमें मायूसी का आलम पाया जा रहा है तथा वे कमजोर व गरीब होने के कारण मिलने वाली उपेक्षा का शिकार महसूस कर रहे हैं और उनकी नाराजगी वाजिब है तथा अब देखना यह होगा कि ऐसे मामलों में पार्टी हाईकमान क्या रुख अपनाती है। राजनीतिक गलियारों में इस मामले को कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने वाले मामले को तौर पर देखा जा रहा है तथा इस संवेदनशील समय में इसका नुकसान भी हो सकता है की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

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