
पांच दिन से हम आपको फेसबुक एवं यूट्यूब पर चैनल चलाने वाले कथित-तथाकथित स्वयंभू पत्रकारों के काले कारनामों एवं उनके द्वारा ब्लैकमेलिंग का गौरखधंधा कैसे चलाया जा रहा है के बारे में जागरुक करने का प्रयास कर रहे हैं। हमारे इस प्रयास से जहां समाज में सुधार चाहने वाला वर्ग खुश नज़र आ रहा है वहीं स्वयंभू पत्रकारों को हमसे खुजली होने लगी है तथा इनके सहारे जिन बड़े पत्रकारों की गाड़ी चल रही है वह भी खफा-खफा से नज़र आने लगे हैं। जबकि उन्हें भी हमारा साथ देकर ऐसे तथाकथित और पत्रकारिता को बदनाम करने वालों के खिलाफ मोर्चा खोलना चाहिए। परन्तु दुख तो इसी बात का है कि जिस प्रकार एक कुल्हाड़ी की हत्थी पेड़ से बनी होती है और वह सोचती है कि वह कितनी मजबूत है और उसी के सहारे लोहे की कुल्हाड़ी पेड़ों को जड़ से काट फेंकती है। उसी प्रकार पत्रकारिता के अक्स को पहुंच रहे नुकसान के लिए हम सभी बराबर के जिम्मेदार हैं, जो ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज उठाना भी जरुरी नहीं समझ रहे। दूसरों की कमियों को उजागर करके समाज में सुधार लाने की ताकत रखने वाला पेशा आज सरेआम बदनाम हो रहा है और इसके पैरोकार चुप्पी साधे और आंखें बंद करके सारा तमाशा देख रहे हैं।

स्टैलर की सामाजिक चुटकी
आलम यह है कि बिना किसी लाइसेंस या स्वीकृत्ति तथा किसी अधिकृत संस्थान के साथ काम किए इन लोगों की तादात इतनी बढ़ रही है कि लगभग हर शहर ही इनके शिकंजे में है। हम यह नहीं कह रहे या किसी पत्रकार को क्लीन चिट दे रहे कि जो अधिकृत पत्रकार हैं उनमें ब्लैकमेलर या यैलो जरनलिज़म करने वाले नहीं हैं, सही और गलत तो हर जगह हैं। सवार इतना ही है कि अगर कोई बिना पढ़े या प्रतियोगी परीक्षा दिए डाक्टर, पीसीएस, आईपीएस, इंजीनियर आदि नहीं बनता तो कोई खुद को पत्रकार कैसे कह सकता है। जबकि पत्रकार बनने के लिए भी पढ़ाई करनी पड़ती है तथा अगर आपने मास मीडिया नहीं भी किया तो कम से कम आपका ग्रेजुएशन होना जरुरी है ताकि आपको हर क्षेत्र एवं विभाग की कम से कम जानकारी तो हो। फिलहाल तो इनका मकसद बिना तहकीकात समाचार लगाना और उसके बाद गलत काम करवाने एवं पैसे ऐंठने का दवाब है। जिस कारण अच्छे पत्रकार भी इनके कथित गुनाहों में शामिल हो जाते हैं और लोग उन्हें भी ब्लैकमेलर की नज़रों से देखने लग जाते हैं।
इसके अलावा पत्रकार बनने के लिए किसी अधिकृत संस्थान के साथ काम करना या सरकार द्वारा तय नियमों एवं शर्तों को पूरा करके लाइसेंस होल्डर बनकर खुद मालिक बनकर काम करना आदि जैसे प्रावधान हैं। फेक न्यूज़ का जिस प्रकार समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार फेक पत्रकार भी समाज को दिशाहीन करने का ही काम कर रहे हैं। जिन पर लगाम लगाने के लिए सरकार को तो कदम उठाने ही चाहिएं, साथ ही समाज के हर वर्ग एवं संस्थाओं को भी इन्हें रोकने के लिए आगे आना समय की मांग है। अन्य था अगर आपका बच्चा पत्रकारिता में भविष्य बनाने की सोच रहा है तो आप खुद अंजादा लगाइए कि हम उसे क्या वातावरण देंगे कि वह स्वतंत्र एवं निडर सोच के साथ अपने काम के साथ न्याय कर सके। मौजूदा समय में तो देखिए आलम यह है कि इन जैसे पत्रकारों ने यूनियनें तक बना डाली हैं और प्रशासन एवं सरकारें खुली आंखों से सारा तमाशा देख रहे हैं, जबकि इनके काले कारनामों के कारण आम जनता के साथ-साथ सरकारी विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारियों का कामकाज बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। वैसे एक बात है हमारा किसी से कोई वैर विरोध नहीं है, अगर यह लोग काम करना चाहते हैं तो कानून औपचारिकताएं पूरी करके कर लें या सरकार इनके लिए कोई नियम बना दे ताकि कम से कम सरकार या जनता को पता तो चले कि अनाधिकृत औक अधिकृत में क्या अंतर होता है। फिलहाल तो लोग इसी असमंजस में हैं कि यह पत्रकार तो दूसरे पत्रकारों से भी बड़े हैं औऱ इनका दबका भी ज्यादा है।
आज यह हमारा अंतिम अंक है तथा हमें उम्मीद है कि आप हमारे द्वारा प्रदान जानकारी से काफी हद तक सहमत होंगे और ऐसे लोगों को प्रोत्साहन देने के स्थान पर उनका बायकाट करने जैसे कदम उठाएंगे ताकि हम अपनी भावी पीढ़ी को एक स्वच्छ प्लेटफार्म उपलब्ध करवा सकें और इस पेशे से जुड़कर किसी को शर्मिंदगी न उठानी पड़े। आगे आप खुद समझदार हैं। हमें दे इजाजत। जय राम जी की।












