
कपूरथला (द स्टैलर न्यूज़), गौरव मढ़िया।28 जून को होने वाली रथ यात्रा के उपलक्ष्य में इस्कान कपूरथला की ओर से 22वी संध्या फ़ेरी बसन्त विहार में बड़े हर्षो उल्लास से निकाली गई। जिसमें भक्तों का सैलाब देखने को मिला। लोगो मे भगवान की रथ यात्रा प्रति उत्साह दिन प्रति दिन बढ़ रहा है। लोगो ने भगवान जगन्नाथ जी की पालकी के समक्ष बहुत ही उत्साह से नृत्य किया। लोगो ने पुष्प वर्षा के साथ भगवान का स्वागत किया। इस संध्या हरिनाम फ़ेरी की समाप्ति आरती मिक मोबाइल वाले श्री तिलक राज मल्होत्रा जी, अजय मल्होत्रा जी और टीनू मल्होत्रा जी के निवास स्थान पर बड़े ही उत्साह से की गई। परिवार ने भगवान का स्वागत बड़े ही शुद्ध भाव से किया। प्रथम आरती पंकज रेस्टोरेंट वाले श्री तरुण साहनी जी के निवास स्थान पर जाकर की गई।

भगवान की कथा का गुणगान करते हुए नकुल दास (नीरज अग्रवाल) जी ने बताया की अगर हम भगवान् की प्राप्ति करना चाहते हैं तो वो केवल एक प्रमाणिक संस्था में रहकर एक प्रमाणिक गुरु की शरण में रहकर ही हो सकती है। गुरु की कृपा के बिना भगवान् की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु की कृपा हमें तभी प्राप्त हो सकती है जब हम उनकी सेवा करेंगे और गुरुँ की सबसे बड़ी सेवा है उनकी अज्ञा का पालन करना।
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते है कि गुरु की सेवा से बढ़कर कुछ भी शुभ नहीं है। जब तक हम इस बारे में पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो जाते, तब तक हम ठीक से अपने गुरु की शरण नहीं ले सकते और यह नहीं समझ सकते कि वे हमारे आश्रय, रक्षक और पालनकर्ता हैं। वेद कहते हैं, सर्वस्वम गुरवे दद्यत्, अर्थात् “आध्यात्मिक गुरु को सब कुछ अर्पित किया जाना चाहिए” यदि हम अपना जीवन, धन, बुद्धि, वाणी, मन, ज्ञान और शरीर उनके चरण कमलों पर अर्पित करके गुरु की सेवा नहीं करते हैं, तो हम भौतिक आसक्ति को दूर नहीं कर पायेंगे। हम अपनी भौतिक कमानाओं को नहीं छोड़ेंगे; हमारा भौतिक रोग (भवरोग) दूर नहीं होगा, और हमारा भ्रम, भय और संकट दूर नहीं होगा। गुरु के चरणों में पूरी तरह से समर्पण करने से हम भ्रम, भय और शोक से मुक्त हो जाते हैं। यदि हम गुरु की अहैतुकी कृपा की कामना करते हैं, तो आध्यात्मिक गुरु हमें बिना किसी कपट के आशीर्वाद देंगे। इस आशीर्वाद का सौभाग्य तब किसी को तभी प्राप्त होगा जब उसके हृदय में प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में रहकर भगवान के नाम, धाम, रूप, गुण तथा लीलाओं की महिमा का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करने की तीव्र कामना होगी । “परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम” कलियुग में यह संकीर्तन आंदोलन (भगवान के नाम का जप और कीर्तन) मानवता के लिए परम वरदान है और यह भगवान से सीधे जुड़ने और भगवदप्रेम विकसित करने की सर्वोत्तम विधि है।
भगवान जगन्नाथ जी अपने भक्तो को दर्शन देने के लिये स्वयं अपने धाम से निकल कर बाहर आते है. भगवान अपने भक्तो से आनंद का प्रदान करने के लिए स्वयं अवतरित होते हैं. हमे भगवान के उत्सव के लिए हमेशा उत्साहित होना चाहिए .आगे बताते हुये प्रभुजी ने कहा की हमारी परेशानी का मूल कारण हमारा यह भोतिक शरीर है.ये शरीर नाशवान है जो एक न एक दिन नष्ट हो जायेगा. परन्तु आत्मा नित्य रहने वाली है. शरीर के नष्ट होने से आत्मा का आसित्व समाप्त नही हो जाता. शरीर इन्द्रयो से बना है ओर ये इन्द्रया हमेशा अपने विषय विकारो की भुखी होती है. एक मूल कारण यह भी है की अगर हमें कोई बुरा बला भी कहता है तो हम परेशान हो जाते है. क्युकि अभी हम शरीर के स्तर पर सोच रहे हैं आत्मा के स्तर पर नही. शरीर के स्तर पर हम सांसारिक वस्तुओ का भोग करना चाहते हैं जो हमे दुख की ओर ले जायेगा. हम इस संसार मे आनंद की खोज करते है जिससे हमे दुख मिलता है. क्युकि ये संसार दुखो का घर है. यहा हर एक जीव दुखो मे फ़सा हुआ है अगर हम इस दुखो को दूर करना चाहते हैं तो हमे भगवान कृष्ण की शरण मे जाना होगा यहा ओर हमे सच मे आनंद की प्राप्ति होगी.सुख ओर दुख को अनुभव करने का मूल कारण हमारा यह भोतिक शरीर है. शरीर ओर मन विशेष परिसिथतियो मे सुख ओर दुख का अनुभव करते है. इस भोतिक संसार मे हर जीव सुख की प्राप्ति करना चाहता है. क्युकी सुख ही आत्मा का मूल स्वरूप है.आत्मा परमेश्वर का अभिन्न अंश है. हर जीव यहा पर आनंद की प्राप्ति करना चाहता है .परंतु इस संसार मे आनंद केवल कृष्ण भगवान की भक्ति ओर उनका नाम स्मरण से ही अनुभव किया जा सकता है. जब हम भगवान का स्मरण करते है ओर अपनी इन्द्रयो को नियंत्रित करते हैं तब हमे भगवान के नाम से आनंद मिलता है. हमारी इच्छाओ के कारण ही हमे दुख सुख मिलते हैं क्युकी भगवान स्वयम् सच चित आनन्द हैं। आत्मा का स्वरूप सेवा ही है। जो बिना किसी इच्छा, कामना, लालसा के भगावान कृष्ण की सेवा मे करता है. वह अन्य किसी की सेवा करके कृष्णभावना सम्बन्धी सेवा मे व्यवधान नही आने देता. किन्तु संसार की दूैतता से विचलित हुये बिना भगवान की सेवा मे रहता है. जो सफ़्लता ओर असफ़लता दोनों मे स्थिर रहता है। वही भगवान् के प्रति आसक्त हो सकता है और भगवान् को संतुष्ट कर सकता है।
आगे बताते हुए प्रभु जी ने कहा की 28जून को सभी शहर निवासियो के सहयोग के साथ भगवान की दिव्य रथ यात्रा निकाली जायेगी। सभी से प्रार्थना है की 28 जून को भगवान् की सेवा में उपस्तिथ रहें और अपने जीवन को सफल करें।












