
‘आप’ के विधायक भी लाजवाब हैं। एक तो अकसर ही चर्चा में रहते हैं। कुछ समय की बात है उन्होंने एक गांव में अपने समर्थकों से कहा यानि कि पंचायत से कहा कि उक्त विभाग आपके गांव में सोलवर लाइटें लगाएगा, अब तो खुश हो जाओ। लाइटें लगीं तथा विभाग के अधिकारियों ने कहा कि इसकी पेमैंट पंचायत को करनी होगी। ऐसा सुनते ही पंचायत की खुशी गम में बदल गई कि अगर उन्होंने ही पैसे खर्च करने थे तो वह दो-चार जगह पता करने के बाद लाइटें लगवाते, हो सकता था कि उन्हें इस रेट से कम में मिल जातीं। खैर, मरता क्या न करता वाक्य को चरितार्थ करते हुए पंचायत ने पेमैंट कर दी।

स्टैलर चुटकी
इसके बाद फिर पंचायत के पास प्रोजैक्ट पहुंचा, सीवरेज का। वह भी पंचायत फंड से करवाने के आदेश दे दिए गए, जबकि ठेका अपने जिले से बाहरी ठेकेदार को दे दिया गया। अब ऐसा क्यों हुआ यह तो विधायक जी जाने, विभाग के अधिकारी जानें या …। अब रुक-रुक कर काम हो रहा है, क्योंकि बारिश ही बहुत हो रही है। गांव वाले तंग आ चुके हैं कि उनके साथ अपनी जूतियां अपना सर वाली कहावत सच हो रही है, कि अगर पंचायत फंड सरकार व सरकारी तंत्र को इतना ही खटक रहा था तो उन्हें कह देते, वह खुद ही काम करवा लेते। पर, सत्ताधारियों एवं अधिकारियों को कोरी वाह-वाह जो लूटनी थी कि सरकार ने काम करवा दिया।
अब तो हालात यह हैं कि गांव वालों ने मन बना लिया है कि, चलो कोई न, आई 2027, फेर देखांगे। यह एक हाल एक गांव या एक विधायक जी के हल्के का नहीं बल्कि दिन-रात गांवों एवं इलाके की चिंता करने वाले सफेद कपड़ा धारी नेताओं के इलाकों में भी लागू हो रही है, जहां धीरे-धीरे लोगों का मोह उनसे भंग हो रहा है। कौन से नेता हैं? आप समझ तो गए हैं, पुरानी आदत से मजबूर हैं कि मैं ही बताऊं। आप सब जानी जान हो, मैं तो सूत्र मात्र हूं। आज्ञा दें। जय राम जी की।











