
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक प्रवचन के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहां कि जब संसार में मर्यादाओं का उल्लंघन हो जाता है तो भगवान अवतार लेते हैं। वह अपनी शक्ति से मर्यादाओं की स्थापना करते हैं। इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है।

गीता में भगवान कहते हैं कि सृष्टि में भगवान ने दो स्वभाव के जीव बनाए हैं। एक आसुरी स्वभाव और एक देवी स्वभाव। जब आसूरी शक्तियां बढ़ जाती है तो भगवान संसार में देव और असुरों में संतुलन बनाने आते हैं। परंतु भगवान देवताओं के पक्ष में रहते हैं। देवासुर संग्राम में देवताओं की जीत हुई। राम रावण युद्ध में सच्चाई की जीत हुई। द्वापर में भी ईश्वर ने धर्म अर्थात देवो का पक्ष लिया। आज संसार में आसुरी शक्तियां बढ़ रही हैं। मनुष्य में अगर अच्छे गुण आ जाए तो वह देवता बन जाता है। बुरे गुण आ जाए तो असुर बन जाता है। हमे दैवी गुण ला कर ईश्वर का पक्ष लेना चाहिए। देवो का मन शुद्ध होता है, दान की प्रवृति होती है। इंद्रियों का दमन होता है।
स्वाध्याय शीलता होती है, सत्य होता है। हमारे अंदर क्षमा की भावना होनी चाहिए। ऐसे स्वभाव वालों को मुक्ति प्राप्त होती है। आसुरी गुण पतन का कारण है। आसुरी स्वभाव वालों को अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होता। वे अपनी मर्जी से काम करते हैं। जीवन में झूठ बोलते हैं। शुद्धता और सच्चाई से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। आसुरी स्वभाव वालों को भगवान का भी कोई खौफ नहीं होता। उनके काम उग्र होते हैं। उनमें दया नाम की कोई चीज नहीं होती। उनकी कामनाएं इतनी होती है की पूरी नहीं की जा सकती। वह हमेशा चिंता में रहते हैं। जो दूसरों का बुरा चाहेगा उसे शांति कैसे मिलेगी। काम और भोग उनके जीवन का लक्ष्य होता है। काम क्रोध रजोगुण से पैदा होते हैं। हमे जीवन में दैवी गुण ग्रहण करने चाहिए व आसुरी गुण त्यागने चाहिए।












