
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि गुरु को याद करने से उनकी शिक्षाओं का स्मरण होता है। जब भी मनुष्य जन्म मिलता है तो उस पर तीन ऋण होते हैं। एक माता-पिता का जिन्होंने हमें जन्म दिया दूसरा ऋषियों का ऋण जिनका संचित ज्ञान हमें प्राप्त हुआ। तीसरा देव ऋण होता है। हवा पानी आदि पांच तत्व देव है।

यह ऋण हमें चुकाने हैं, यही हमारा धर्म है। दो तरह के कर्तव्य होते हैं। एक धर्म प्रेरित कर्तव्य होते हैं दूसरे मोह प्रेरित कर्तव्य। दुख की बात है कि मोह प्रेरित कर्तव्य तो सभी करते हैं लेकिन धर्म प्रेरित कर्म कोई नहीं करता। शास्त्रों में लिखा है कि पिता चाहे कहीं भी हो पुत्र अपने कर्मों से उनका कल्याण कर सकता है। पुत्र सात पीढ़ियों को तार देता है। आज बहुत से पुत्र अपने माता-पिता का हाल केवल टेलीफोन पर ही पूछते हैं। उनके पास उनकी सेवा करने के लिए समय ही नहीं है। बाद में जब माता-पिता संसार छोड़ जाते हैं तभी वह उनके पास आते हैं।
लेकिन तब आने और ना आने से कोई फर्क नहीं पड़ता। कैसी विडंबना है कि बच्चे भूल जाते हैं कि उनके माता-पिता ने उनके लिए कितना कष्ट झेला है। जहां तक देव ऋण का प्रश्न है हम पांचो देवताओं को गंदा कर रहे हैं। इसलिए हम रोगी हो रहे हैं। हम हवा जल को दूषित कर रहे हैं इसीलिए बीमार हो रहे हैं। आकाश में फैल रही गैसीय तरंगे हमें परेशान कर रही है। तीसरा ऋण ऋषि ऋण है। उन्होंने हमें जो ज्ञान दिया है हमें उनसे लाभ उठाना चाहिए। श्रीमद् भागवत गीता योग का शास्त्र है। इसके अंदर के ज्ञान को समझे। ये तीन ऋण हर एक धर्म के लिए है। उन्होंने कहा कि हमें योग विद्या का ज्ञान हासिल करना चाहिए। योग के दो अंग राजयोग और हठयोग हैं। षट्कर्म करने से लाभ होगा। इसमें से कम से कम कुछ तो करें। शरीर की सफाई से ही बहुत कुछ हासिल हो जाएगा। इसी तरह राजयोग में हम अष्टांग योग करें।











