
चंडीगढ़ (द स्टैलर न्यूज़), पलक।

ढोल दी थाप ते नचदे ने यार,
खेतां विच आई खुशियों दी बहार,
सोने वरगी फसल लहराई,
बधाई हो जी, आई बैसाखी आई।
उत्तर भारत, खासकर पंजाब और हरियाणा में धूमधाम से मनाया जाने वाला बैसाखी का त्योहार इस बार भी उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व न केवल नई फसल के आगमन की खुशी का प्रतीक है, बल्कि किसानों के परिश्रम और समृद्धि का भी जश्न है। सिख धर्म में बैसाखी का विशेष धार्मिक महत्व है, क्योंकि इसी दिन खालसा पंथ की स्थापना हुई थी। गुरुद्वारों में विशेष दीवान सजाए जाते है, नगर कीर्तन निकाले जाते है और श्रद्धालु बड़ी संख्या में गुरूद्वारा साहिब में नतमस्तक होते है। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे लोग भांगड़ा और गिद्धा कर इस त्योहार को चार-चांद लगा देते है। वहीं, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भी बैसाखी की खुशियां चारों ओर बिखर जाती है।
बैसाखी का इतिहास
बैसाखी का त्योहार भारत के प्रमुख और प्राचीन पर्वों में से एक है, जिसका इतिहास धार्मिक, सांस्कृतिक और कृषि परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यह पर्व हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है और खासतौर पर पंजाब क्षेत्र में इसका विशेष महत्व है।इतिहास के अनुसार, बैसाखी का संबंध फसल कटाई से जुड़ा है। इस समय रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। किसान अपनी मेहनत की खुशी में इस दिन उत्सव मनाते हैं। इसलिए बैसाखी को फसल उत्सव के रूप में भी जाना जाता है।
सिख इतिहास में बैसाखी का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस दिन उन्होंने सिखों को एक नई पहचान दी और उन्हें साहस, समानता और धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित किया। इसके अलावा, बैसाखी का संबंध भारतीय नववर्ष से भी माना जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, जैसे असम में बिहू, बंगाल में पोहेला बोइशाख और केरल में विशु। इस प्रकार, बैसाखी का इतिहास न केवल कृषि परंपराओं से जुड़ा है, बल्कि यह धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है।
मेष संक्रांति और नववर्ष की शुरुआत
खगोलीय दृष्टि से भी यह दिन बेहद खास है। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने को मेष संक्रांति कहा जाता है, जो नए सौर वर्ष की शुरुआत का संकेत देता है. इस दिन को शुभ कार्यों, दान और पूजा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
फसल का पहला अन्न भगवान को अर्पित
बैसाखी के पावन अवसर पर किसान अपनी नई फसल काटने के बाद सबसे पहले उसका हिस्सा भगवान को अर्पित करते हैं। यह परंपरा श्रद्धा और आभार का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें किसान अपनी मेहनत के फल के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। इसके बाद ही परिवार और समाज के साथ इस खुशी को साझा किया जाता है।
लोगों में क्या परंपराएं हैं?
बैसाखी के दिन लोग विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन करते हैं। सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है और गुरुद्वारों या मंदिरों में जाकर भगवान का आशीर्वाद लिया जाता है। सिख समुदाय में गुरु ग्रंथ साहिब के आगे मत्था टेककर अरदास की जाती है। इसके अलावा, लोग नए कपड़े पहनते हैं, भांगड़ा और गिद्धा जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं और मेलों का आनंद लेते हैं। इस दिन दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है। इस तरह वैसाखी का विधान धार्मिक आस्था, फसल की खुशी और सामाजिक एकता को दर्शाता है।











