
दिल्ली (द स्टैलर न्यूज़)। दिल्ली कोर्ट ने हरियाणा की एक न्यायिक अधिकारी से जुड़े 52 लाख रुपये के कथित हनीट्रैप और साइबर ठगी मामले में आरोपी की जमानत खारिज कर दी है। मामले में शिकायत घरेलू सहायिका ने दर्ज कराई थी, जबकि असली पीड़िता जज बताई गई हैं। कोर्ट ने जांच में खामियों पर सवाल उठाते हुए व्हाट्सऐप चैट और टिंडर डेटा सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं।

दिल्ली से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां हरियाणा की एक न्यायिक अधिकारी कथित तौर पर हनीट्रैप और साइबर ठगी का शिकार हो गईं। इस मामले में करीब 52 लाख रुपये की ठगी का आरोप है। अदालत ने इस केस में आरोपी दीपक वत्स की जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामले में सबसे अहम बात यह सामने आई कि इस केस की शिकायत खुद न्यायिक अधिकारी ने नहीं बल्कि उनके घर में काम करने वाली घरेलू सहायिका दीक्षा देवी ने दर्ज कराई थी। यही शिकायत दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के पास 1 फरवरी 2026 को दर्ज हुई थी। शिकायत में कहा गया था कि एक अज्ञात शख्स ने ऑनलाइन डेटिंग ऐप के जरिए धोखा देकर लगभग 52,81,999 रुपये की ठगी की।
जांच में पता चला कि यह रकम सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारी के खातों से ट्रांसफर की गई थी। हालांकि शिकायतकर्ता के रूप में घरेलू सहायिका का नाम सामने आया, जिससे पूरे मामले में गंभीर सवाल खड़े हो गए। आरोपी ने खुद को अभिमन्यु वशिष्ठ बताकर एक गोपनीय सरकारी विभाग का अधिकारी होने का दावा किया था। आरोपी और न्यायिक अधिकारी की पहचान टिंडर ऐप के जरिए हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और कथित तौर पर रिश्ता भी गहरा हुआ।
आरोप है कि आरोपी ने न्यायिक अधिकारी को निवेश और मुनाफे का लालच देकर गेमिंग और बेटिंग ऐप में पैसे लगाने के लिए प्रेरित किया। इसी दौरान बड़ी रकम ट्रांसफर की गई। बाद में जब कोई लाभ नहीं मिला तो ठगी का शक गहराया। दिल्ली कोर्ट ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जांच में कई खामियां हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने मोबाइल फोन से जरूरी डेटा और चैट रिकॉर्ड सही तरीके से इकट्ठा नहीं किए हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि शिकायत में असली पीड़िता और शिकायतकर्ता अलग-अलग हैं, जिससे मामले की जांच जटिल हो गई है। कोर्ट ने कहा कि यह साफ मामला होते हुए भी जांच में इसे उलझा दिया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारी को खुद सामने आकर पूरी सच्चाई जांच एजेंसियों और अदालत के सामने रखनी चाहिए. कोर्ट ने माना कि इस तरह के मामलों में निजी शर्मिंदगी जांच को प्रभावित नहीं कर सकती।
कोर्ट ने आरोपी के व्यवहार पर भी सवाल उठाए और कहा कि वह कुछ अहम जानकारियां छिपा रहा है, जिससे जांच प्रभावित हो रही है। जमानत खारिज करते हुए कोर्ट ने जांच अधिकारी को निर्देश दिए कि न्यायिक अधिकारी के मोबाइल से संबंधित अवधि की सभी व्हाट्सऐप चैट निकाली जाएं। इसके अलावा टिंडर ऐप से जुड़े डेटा को भी सुरक्षित रखा जाए, ताकि पूरे मामले की सही जांच हो सके। फिलहाल मामला जांच के अधीन है और पुलिस साइबर फ्रॉड, निवेश धोखाधड़ी और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही है।












