
आरक्षण और सरकारी सुविधाओं को लेकर अकसर ही समाज में कई तरह की बातें व बहस सुननें को मिलती है। किसी का कहना है कि जनरल वर्ग के साथ अन्याय हुआ तो कोई कहता है कि एससी/बीसी वर्ग को मिले अधिकार सामाजिक न्याय के लिए जरूरी थे। कई लोगों के मन में सवाल होता है कि आखिर जनरल वर्ग को क्या मिला, जबकि एससी और बीसी वर्ग के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। ऐसे में भावनाओं से हटकर केवल तथ्यों के आधार पर समझना जरूरी है कि अब तक किस वर्ग को कौन-कौन से लाभ मिले और क्यों मिले?

आखिरकार जाति व्यवस्था बनी कैसे?
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था एक दिन में नहीं बनी, बल्कि यह हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुई। इतिहासकारों के अनुसार, शुरुआत में समाज का विभाजन लोगों के काम और पेशे के आधार पर था, जिसे वर्ण व्यवस्था कहा गया। समय के साथ अलग-अलग व्यवसाय, क्षेत्रों, परंपराओं और समुदायों के कारण ये समूह स्थायी होते गए। धीरे-धीरे विवाह अपने ही समुदाय में होने लगे और सामाजिक पहचान जन्म से तय होने लगी, जिससे हजारों जातियां अस्तित्व में आईं। इस प्रक्रिया में कुछ समुदायों को अधिक अवसर मिले, जबकि कई अन्य समुदाय सामाजिक भेदभाव और वंचितता का सामना करते रहे। इसी ऐतिहासिक असमानता को दूर करने के लिए स्वतंत्र भारत के संविधान ने समानता का अधिकार दिया और सामाजिक न्याय के उद्देश्य से विशेष प्रावधान तथा आरक्षण की व्यवस्था की।
चार वर्णों से हजारों जातियां कैसे बनीं?
प्राचीन ग्रंथों में ऋषियों द्वारा वर्णित चार वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- समाज के कार्यों के आधार पर बताए गए थे। इतिहासकारों का मानना है कि समय के साथ यही वर्ण व्यवस्था अलग-अलग क्षेत्रों, पेशों और स्थानीय समुदायों में विकसित होकर हजारों जातियों (जाती/जति) में बदल गई। हालांकि, आज की जातियां और प्राचीन वर्ण व्यवस्था बिल्कुल समान नहीं हैं। कई आधुनिक जातियां बाद के समय में बनीं और उनकी सामाजिक स्थिति समय और क्षेत्र के अनुसार बदलती रही। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि आज की जाति व्यवस्था का ऐतिहासिक संबंध प्राचीन वर्ण व्यवस्था से माना जाता है, लेकिन दोनों पूरी तरह एक जैसी या समान नहीं हैं। इतिहासकारों के बीच इसके विकास को लेकर अलग-अलग मत भी मौजूद हैं।
ब्रिटिश शासन के बाद General, SC/BC श्रेणियां कैसे बनीं?
ब्रिटिश शासन (1858–1947) से पहले भी भारत में विभिन्न जातियां मौजूद थीं। ब्रिटिश प्रशासन ने 1871 से शुरू हुई जनगणनाओं में लोगों की जातियों का बड़े पैमाने पर रिकॉर्ड तैयार किया। इससे जातियों का सरकारी वर्गीकरण अधिक औपचारिक हो गया। इसके बाद सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की पहचान के लिए “Depressed Classes” जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाने लगे, जिन्हें बाद में स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जाति (SC) के रूप में संवैधानिक मान्यता मिली।
स्वतंत्रता के बाद 1950 में राष्ट्रपति के आदेश (Scheduled Castes Order) के तहत किन-किन समुदायों को SC माना जाएगा, इसकी आधिकारिक सूची बनाई गई। वहीं सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए OBC (Other Backward Classes) की अवधारणा विकसित हुई। मंडल आयोग (1979) की सिफारिशों के आधार पर 1990 में केंद्र सरकार ने OBC के लिए आरक्षण लागू किया।
General Category कोई अलग जाति नहीं है। यह प्रशासनिक श्रेणी है, जिसमें वे लोग आते हैं जो SC, ST या OBC की आरक्षित श्रेणियों में शामिल नहीं हैं। बाद में 2019 में EWS (Economically Weaker Sections) के लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण की व्यवस्था भी सामान्य वर्ग के पात्र लोगों के लिए की गई।
SC (अनुसूचित जाति): स्वतंत्रता के समय संविधान निर्माताओं ने माना कि अनुसूचित जातियों ने सदियों तक सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, शिक्षा और रोजगार से वंचित रहने जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना किया। इसी ऐतिहासिक असमानता को कम करने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से संविधान में विशेष प्रावधान किए गए। इसके तहत केंद्र सरकार की नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में 15% आरक्षण, संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटें, प्री-मैट्रिक व पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्तियां, हॉस्टल सुविधाएं, कोचिंग योजनाएं, स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने वाली योजनाएं तथा अत्याचार से सुरक्षा के लिए विशेष कानून लागू किए गए। समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारों ने SC समुदाय के लिए शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ी कई योजनाएं भी शुरू कीं।
SC, OBC और General को क्या और क्यों मिला?
OBC/BC (अन्य पिछड़ा वर्ग): अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC/BC) के लिए यह माना गया कि समाज के कई समुदाय सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं। इन्हें बेहतर अवसर देने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1990 में केंद्र सरकार ने सरकारी नौकरियों और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण लागू किया। इसके साथ ही छात्रवृत्तियां, कौशल विकास कार्यक्रम, स्वरोजगार योजनाएं, प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग, व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता और विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गईं। हालांकि OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर का नियम लागू है, जिसके तहत निर्धारित आय सीमा से अधिक आय वाले परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
General वर्ग: General वर्ग के लोगों को संविधान के तहत अन्य सभी नागरिकों की तरह समान मौलिक अधिकार मिले। लंबे समय तक इस वर्ग के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में कोई आरक्षण नहीं था और उन्हें मुख्य रूप से अनारक्षित (Open) सीटों पर प्रतियोगिता करनी पड़ती थी। हालांकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सहायता देने के उद्देश्य से वर्ष 2019 में EWS (Economically Weaker Sections) के तहत 10% आरक्षण लागू किया गया। यह आरक्षण केवल उन सामान्य वर्ग के परिवारों को मिलता है जो सरकार द्वारा तय आर्थिक और अन्य पात्रता शर्तों को पूरा करते हैं। इसके अलावा General वर्ग के पात्र विद्यार्थी मेरिट आधारित छात्रवृत्तियों, शिक्षा ऋण योजनाओं और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी ले सकते हैं।
सरकारी योजनाएं: भारत सरकार और राज्य सरकारों ने ऐसी कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनका लाभ जाति के आधार पर नहीं बल्कि पात्रता के आधार पर दिया जाता है। इनमें आयुष्मान भारत योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री जन धन योजना, उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, मुद्रा योजना, स्किल इंडिया मिशन, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाएं शामिल हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य गरीब, जरूरतमंद, किसान, महिलाएं, युवा और छोटे उद्यमियों को सहायता देना है। इसलिए SC, ST, OBC, General या EWS—यदि कोई व्यक्ति संबंधित योजना की पात्रता पूरी करता है, तो वह उसका लाभ उठा सकता है।
क्या सभी श्रेणियों को मिलनी चाहिए समानता?
यह सवाल आज भी देश की सबसे बड़ी सामाजिक और नीतिगत बहसों में से एक है। संविधान सभी नागरिकों को समान मौलिक अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की भी अनुमति देता है। एक वर्ग का मानना है कि अब सरकारी सुविधाओं और अवसरों का आधार केवल आर्थिक स्थिति और जरूरत होनी चाहिए, जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि जब तक सामाजिक असमानताएं पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं, तब तक आरक्षण और विशेष प्रावधान जरूरी हैं। इसलिए यह मुद्दा केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि समान अधिकार, समान अवसर और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाने का है, जिस पर आज भी सरकार, न्यायपालिका और समाज में लगातार चर्चा होती रहती है।
पलक (लेखिका द स्टैलर न्यूज़ की वरिष्ठ पत्रकार हैं और समाज चिंतक के रुप में कार्यरत हैं)











