
दसूहा (द स्टैलर न्यूज़)। पंजाब के जिला होशियारपुर में दसूहा शहर के कंडी क्षेत्र की शिवालिक पहाड़ियों की गोद में स्थित शेषनाग मन्दिर श्रद्धा तथा आस्था का केन्द्र है। सावन के महीने नाग पंचमी के दिन दूर-दूर से श्रद्धालु नतमस्तक होने के लिए आते हैं। यह प्राचीन मंदिर गांव बिंद्रांवन (वुंदावन) के विशाल जंगलो में स्थित है।इस मन्दिर में एक सरोवर भी है जिसका इतिहास रामानन्द सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्री रामानन्दाचार्य के शिष्य परम्परा के सन्त श्री 1008 वैष्णवावार्य बाबा लाल जी के प्रधान शिष्य श्री तपादास जी महाराज की तपोस्थली 16वीं शताब्दी से जुड़ा है तथा निर्मित यह सरोवर स्वच्छ एवं शीतल जल से भरा था एक श्रद्धालु सेविका यहांँ मंदिर में माथा टेकने आई उसके साथ एक छोटा बच्चा भी था चंचलता वश खेलता हुआ सरोवर में गिर गया मां के करूणा पूर्ण क्रबदन करने पर एक अदृश्य दिव्य शक्ति ने बताया कि बच्चे और सरोवर के पानी में से किसी एक को चुन लो मां की ममता ने बच्चे के जीवन को प्राथमिकता दी नाग देवता जी की भयंकर फुन्कार से सरोवर का पानी सूख गया और पास का मंदिर भी फट गया जो आज भी सरोवर और मंदिर उसी स्थिति में ही है। यहां प्रति वर्ष नांग पंचमी का मेला लगता है इस दिन नाग देवता की पूजा कर श्रद्धालु आशीर्वाद लेते हैं ।इस मंदिर का इतिहास 16वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है।

हिन्दू धर्म और पुराणों में नाग देवता का इतिहास ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से जुड़ा है कद्रू ने नागों को जन्म दिया जो पाताल लोक में निवास करते हैं प्रमुख नागों में शेषनाग (अनंत) वासुकी और तक्षक शामिल है जिनका संबंध भगवान विष्णु जी और भगवान शिव जी से है।भगवान विष्णु जी शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं और भगवान शिव जी वासुकी नाग को अपने गले में आभूषण की तरह धारण करते हैं ।नांग वंश प्राचीन भारत में कई राजवंश स्वय को नागवशी मानते थे इतिहास में तक्षशिला के राजा तशक और महाभारत काल के कई राजवंश स्वय को नागवंशी मानते थे। इतिहास में राजा तशक और महाभारत काल के कई प्रसंगों में नामों का विशेष वर्णन मिलता है।
नाग पूजन का पर्व नाग पंचमी
सावन माह में भगवान की कृपा के लिए लोग पूरा महीना अनेक व्रत अभिषेक हवन यज्ञ एवं धार्मिक अनुष्ठान करते हैं तथा सावन माह शुक्ल पक्ष की पंचमी को जिसे नाग पंचमी के रूप में नाग देवता की पूजा करके मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में प्रभु द्वारा रचित सारे सृष्टि के रक्षा के लिए अनेक जीवों की विभिन्न प्रकार से बड़ी श्रद्धा भाव से पूजा की जाती है। सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागों का पूजन करने का विधान है ऐसा करके लोग नाग देवता को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। नाग भगवान शंकर जी के आभूषण है तथा उनके गले में लिप्त रहते हैं। शास्त्रों के अनुसार हमारी पृथ्वी का भार भी शेषनाग के फन पर टिका हुआ है। भगवान विष्णु तो शेषनाग की शय्या क्षीर सागर में विराजमान है। मान्यता है कि जब-जब भगवान ने धरती पर अवतार लिया है शेषनाग भी उनके साथ किसी न किसी रूप में अवतरित होते रहे हैं। वासुदेव जी जब नन्हे कृष्ण को लेकर गोकुल जाने के लिए जमुना पार कर रहे थे तब भगवान श्री कृष्ण जी के सिर पर नागफनों की छाया करके नाग देवता ने ही उन्हें बचाया था।
क्यों मनाई जाती है नाग पंचमी?
शास्त्रों के अनुसार सावन माह की पंचमी को सभी नाग सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से मिलने गए थे तथा उसी दिन उन्हें श्राप से मुक्ति मिली थी। वराह पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपनी कृपा से शेषनाग को अलंकृत किया था। तब से धरती का भार धारण करने की सेवा लेने पर लोगों ने नाग देवता के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उनका विधिवत पूजन किया तथा इस परंपरा के अंतर्गत हर वर्ष नाग पंचमी पर नागों की पूजा विधिपूर्वक की जाती है। नाग देवता का आशीर्वाद पाने के लिए नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा करने की मान्यता है तथा इस दिन नामूर्तियों को पंचामृत स्नान करने की परंपरा है। बहुत से लोग नाग देवता के दर्शन को शुभ मानते हैं तथा घर के पूर्वजों के रूप में उनका पूजन करते हैं।












