Monday, October 5, 2026
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गुरु मार्ग से स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ता है मानव जीवन: साध्वी राजविद्या भारती

होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) के स्थानीय आश्रम गौतम नगर में आयोजित साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम में गुरु मार्ग, स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा और समाज कल्याण के गंभीर विषयों पर प्रबुद्ध विचारों का प्रवाह हुआ। संस्थान के संस्थापक एवं संचालक सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री राजविद्या भारती ने संगत को संबोधित करते हुए कहा कि मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता केवल अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति में नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के कल्याण में निहित है।

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इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज में अज्ञानता और स्वार्थ का अंधकार बढ़ा, तब-तब गुरु सत्ता ने आकर सही दिशा दिखाई। इस संदर्भ में एक प्राचीन प्रसंग प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि एक बार एक यात्री ने किसी संत से पूछा कि स्वार्थ और परमार्थ में क्या अंतर है? संत ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि जब तक मनुष्य केवल अपने लिए सोचता है, वह एक बंधे हुए जल के समान है जो समय के साथ दुर्गंधयुक्त हो जाता है, परंतु जब वह गुरु के बताए मार्ग पर चलकर समाज के लिए जीने लगता है, तो वह एक बहती हुई निर्मल नदी बन जाता है जो स्वयं पवित्र रहते हुए संपूर्ण तटों को जीवन प्रदान करती है। हमारे पूर्ववर्ती गुरुओं और महापुरुषों ने सदैव धर्म की स्थापना और मानवमात्र की भलाई के लिए ही अपने संपूर्ण जीवन का उत्सर्ग किया। गुरु का मार्ग कोई साधारण पथ नहीं है, यह तो स्वार्थ के अंधकार से निकालकर परमार्थ के शाश्वत प्रकाश की ओर ले जाने वाला अलौकिक सेतु है।

वर्तमान युग में बढ़ती मानसिक अशांति, नैतिक पतन और आत्मकेंद्रित सोच का एकमात्र समाधान गुरु द्वारा प्रदान की जाने वाली आंतरिक जागृति ही है। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के पावन सानिध्य में आज लाखों श्रद्धालु ब्रह्मज्ञान की सनातन दीक्षा प्राप्त कर अपने भीतर छिपी अनंत ऊर्जा और विवेक को जागृत कर रहे हैं। साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि जब तक व्यक्ति का मन अंदर से परिवर्तित नहीं होता, तब तक बाह्य समाज में किसी स्थायी सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती। ब्रह्मज्ञान की यह प्रक्रिया मनुष्य के दृष्टिकोण को व्यापक बनाती है, जिससे उसमें करुणा, निस्वार्थ सेवा और भलाई के भाव स्वतः प्रस्फुटित होने लगते हैं। जब विचार शुद्ध होते हैं, तो आचरण अपने आप कल्याणकारी बन जाता है। यही सनातन परंपरा की मूल भावना है, जहाँ व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर राष्ट्र और जगत् के हित को सर्वोपरि रखता है। आश्रम के वातावरण में गूँजते भक्तिमय भजनों और विचारों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को अध्यात्म की असीम शांति और आत्मचिंतन की प्रेरणा प्रदान की।

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