
चंडीगढ़ (द स्टैलर न्यूज़)। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के कार्यालय से जुड़े कथित भ्रष्टाचार का मामला इन दिनों काफी चर्चा में है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस शील नागू ने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया। अब यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर दूसरी पीठ के समक्ष रखा जाएगा। जस्टिस नागू पहले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं और जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत हुए थे। याचिका पर जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। मामला शुरू होने पर जस्टिस दत्ता ने कहा कि इस मामले की सुनवाई जस्टिस नागू नहीं कर सकते और इसे मुख्य न्यायाधीश दूसरी पीठ को सौंपेंगे। पंजाब सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने बताया कि जस्टिस नागू ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए जनहित याचिकाकर्ता की कुछ याचिकाओं को खारिज करने के आदेश पारित किए थे। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार अपनी मौजूदा याचिका में उन आदेशों पर भरोसा नहीं कर रही है। इसके बावजूद जस्टिस दत्ता ने कहा कि जस्टिस नागू सुनवाई से अलग हो रहे हैं।

उन्होंने टिप्पणी की कि मौजूदा समय काफी कठिन है और यह पता नहीं होता कि हमला कहां से हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में 17 अन्य पीठ भी हैं। यह मामला मुख्यमंत्री भगवंत मान के विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) राजबीर सिंह घुम्मन से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों का है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की पीठ ने सोमवार को सीबीआई को आपराधिक मामला दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया था। यह आदेश अधिवक्ता निखिल सराफ की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से जानकारी और पत्राचार भेजे जाने के बावजूद पंजाब पुलिस ने मामले में उचित कार्रवाई नहीं की। हाई कोर्ट के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार, ईडी ने नितिन गोहल नामक व्यक्ति से जुड़े आरोपों की ओर ध्यान दिलाया था। आरोप है कि वह पंजाब सरकार से विभिन्न लाभ हासिल करने के इच्छुक लोगों और संबंधित पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता था। मामले में तबादले करवाने, गोपनीय सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच दिलाने, हथियार लाइसेंस हासिल कराने और अन्य सुविधाएं दिलाने जैसे आरोप शामिल हैं। इन आरोपों की जांच अभी होनी है और इन्हें सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता है।












