
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। आधुनिक और व्यस्त जीवन में पारिवारिक रिश्तों में बढ़ती दूरियों को कम करने तथा आपसी मेल-जोल की परंपरा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी नामी हस्तियों की एक विशेष बैठक भारत विकास परिषद के अध्यक्ष एवं प्रमुख समाजसेवी संजीव अरोड़ा की अध्यक्षता में स्थानीय होटल में आयोजित की गई। बैठक में इस बात पर गहन विचार-विमर्श किया गया कि किस प्रकार नई पीढ़ी को पारिवारिक रिश्तों के महत्व से जोड़कर समाज में आपसी प्रेम, सम्मान और भाईचारे की भावना को मजबूत किया जा सकता है।

बैठक को संबोधित करते हुए संजीव अरोड़ा ने कहा कि आज छुट्टियां आते ही अधिकांश परिवार हिमाचल प्रदेश और अन्य पर्यटन स्थलों की ओर घूमने निकल जाते हैं। पर्यटन करना अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ-साथ अपने रिश्तेदारों के घर जाकर उनके साथ समय बिताने की परंपरा को भी जीवित रखना जरूरी है। पहले गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे नाना-नानी, दादा-दादी, मामा-मामी, चाचा-चाची और मौसी-मौसा के घर जाकर कई दिन बिताते थे। इस दौरान उन्हें परिवार के सदस्यों से अपनापन, संस्कार और जीवन के अनुभव सीखने का अवसर मिलता था। उन्होंने कहा कि मोबाइल और सोशल मीडिया के इस दौर में व्यक्तिगत मेल-मिलाप कम होता जा रहा है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां रिश्तों की अहमियत समझें, तो हमें स्वयं पहल करते हुए परिवारों के बीच संवाद और मिलने-जुलने की परंपरा को मजबूत करना होगा।
इस अवसर पर सरबत दा भला सोसाइटी के प्रधान आज्ञापाल सिंह सहनी ने कहा कि पारिवारिक रिश्ते हमारी सामाजिक व्यवस्था की मजबूत नींव हैं। रिश्तेदारों के साथ नियमित मेल-जोल से आपसी विश्वास बढ़ता है और सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ देने की भावना विकसित होती है। हमें बच्चों को भी परिवार के व्यापक दायरे से परिचित करवाना चाहिए, ताकि वे रिश्तों को केवल नाम से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव से समझें। लेफ्टिनेंट जनरल जे.एस. ढिल्लों ने कहा कि परिवार व्यक्ति के व्यक्तित्व और मूल्यों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बुजुर्गों के साथ समय बिताने से बच्चों को अनुभव, अनुशासन और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण मिलता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद हमें अपने पारिवारिक संबंधों के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए, क्योंकि मजबूत रिश्ते समाज को भी मजबूती प्रदान करते हैं।
प्रिंसिपल शैलिंदर ठाकुर ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों में अच्छे संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी है। परिवार के बुजुर्गों और रिश्तेदारों के साथ समय बिताने से बच्चों में सम्मान, सहयोग और संवेदनशीलता जैसे गुण पैदा होते हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे छुट्टियों को बच्चों के लिए पारिवारिक जुड़ाव का अवसर भी बनाएं। चंदर प्रकाश सैनी ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग एक-दूसरे से मिलने के बजाय फोन और संदेशों तक सीमित होते जा रहे हैं। रिश्तों की वास्तविक गर्माहट आमने-सामने बैठने, बातचीत करने और एक-दूसरे की खुशियों एवं परेशानियों में शामिल होने से आती है। हमें इस बदलती जीवनशैली के बीच मेल-जोल की पुरानी परंपराओं को फिर से अपनाना होगा।
बैठक में उपस्थित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भी पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाने, नई पीढ़ी को अपने सामाजिक एवं पारिवारिक संस्कारों से जोड़ने तथा त्योहारों, छुट्टियों और पारिवारिक समारोहों को आपसी मेल-मिलाप का माध्यम बनाने पर जोर दिया।बैठक में इस विचार पर सहमति व्यक्त की गई कि पर्यटन और आधुनिक जीवनशैली के साथ-साथ पारिवारिक रिश्तों को समय देना भी उतना ही आवश्यक है। रिश्ते केवल फोन कॉल या सोशल मीडिया संदेशों से नहीं, बल्कि नियमित मुलाकातों, आपसी सहयोग और भावनात्मक जुड़ाव से मजबूत होते हैं। यदि परिवार आज से ही इस दिशा में प्रयास करें, तो आने वाली पीढ़ियों तक प्रेम, सम्मान और भाईचारे की परंपरा को सुरक्षित रखा जा सकता है।इस अवसर पर प्रिंसिपल तरलोचन सिंह, रंजीत राणा, अवतार सिंह, जगमीत सेठी, मनजीत सिंह जंडा, राकेश कुमार, मास्टर गुरप्रीत सिंह सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।












