जागो मतदाता: बिन दूल्हे वाली बारात लेकर चल रही राजनीतिक पार्टियों से सतर्कता की जरुरत

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लोकसभा चुनाव में जहां देश की सबसे बड़ी पार्टियां अपना भाग्य आजमा रही हैं वहीं चुनाव के इस हवन में कुछ ऐसी पार्टियां भी सामग्री लेकर बैठी हैं जिन्हें शायद पता ही नहीं कि हवन किस उद्देश्य से होने जा रहा है। देश में लोकसभा की 543 सीटें हैं और जो पार्टी दो तिहायी बहुमत ले जाती है उसकी सरकार बनती है। जहां देश की सबसे बड़ी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा अन्य कुछेक अन्य संगठनों के साथ मिलकर इस हवन में आहुति डालने के लिए बैठी हुई हैं वहीं कई संगठन ऐसे हैं जो ख्वाब तो देश चलाने का देख रहे हैं, परन्तु उनके पास कोई आधार है और न ही जनता के बीच ठोस मुद्दों के साथ जाने का कोई कारण। इतना जरुर है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए वे भी जनता को कोई न कोई मुद्दा बनाकर अपने पीछे लगाने में कामयाब रहे हैं। आलम यह है कि देश में कई ऐसी पार्टियां हैं जो 543 सीटों पर चुनाव भी नहीं लड़ रहीं मगर जनता को देश में बदलाव लाने का ऐसा सपना दिखा रही हैं कि मानो अगला प्रधानमंत्री उन्हीं की पार्टी का होगा और वे आते ही सिस्टम को सही कर देंगे। मगर, जो पार्टियां अपने दम पर मात्र 10, 20, 25 या सिर्फ 30 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही हो और सरकार बनाने के लिए किसी दूसरे का मुंह देखें क्या वे बदलाव लाने में सक्षम होंगी और उनकी कार्यशैली कैसी रहेगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रीय पार्टियां ऐसी भी हैं जो ऐसी बड़ी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव मैदान में हैं, जिन्हें पता है कि उनकी सहयोगी पार्टी सरकार बनाने में सक्षम है।

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यह बात भी देशवासियों को समझनी होगी कि क्या आज हमारा देश इस परिस्थिति में है कि वो खिचड़ी को संभाल पाए या खिचड़ी सरकार देश को चला पाए, क्योंकि छोटी-छोटी पार्टियां मिलकर जब देश चलाने के लिए आगे आएंगी तो उनके समक्ष जनता के लिए बेहतर योजनाएं बनाने एवं विकास करवाने के स्थान पर अपना-अपना वर्चस्व मजबूत करने और उसे बढ़ाने की तरफ ज्यादा ध्यान होगा।

राजनीतिक माहिरों के अनुसार बदलाव की क्रांति से पैदा हुई आम आदमी पार्टी की स्थिति आज सबके सामने है, देश में स्वराज लाने और आम आदमी को आगे लाने की बात करने वाली इस पार्टी ने पंजाब में एन.आर.आईज. की अपने पंजाब के प्रति प्रेम एवं विकासशील भावना का खूब फायदा उठाया और उनके जजबातों से खेली। पार्टी की शुरुआत में जुड़े जमीनी स्तर के आम कार्यकर्ता को साइड लाइन करके आज इस पार्टी में भी पूंजीपतियों का खासा बोलबाला माना जा रहा है। सुच्चा सिंह छोटेपुर, फिर गुरप्रीत सिंह घुग्गी, धर्मवीर गांधी, एडवोकेट नवीन जैरथ, मैडम यामिनी गोमर, परमजीत सचदेवा व हरिंदर सिंह खालसा जैसे नेता जिन्होंने पार्टी के लिए दिन रात एक करके काम किया किस प्रकार पार्टी को सिद्धांतं से भटकता हुआ देख खुद ही बाहर हो गए। ये नेता थे जिन्होंने पंजाब में आप को खड़ा करने में मेहनत की।
यह रिवाज यहीं खत्म नहीं हुआ बल्कि पंजाब में एक और कांग्रेसी नेता बलदेव खैहरा ने अपनी राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सारी उम्र कांग्रेस में रहने के बाद पहले आप का दामन थामा तो अब पंजाब के विदेश में बैठे गर्मदलियों की सहानुभूति पाने व उनकी भावनाओं को कैश करने के लिए पजंाब एकता पार्टी का गठन करके कुछ सीटों से उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है।
बहुजन समाज पार्टी की बात करें तो वैसे तो यह पार्टी देशव्यापी पार्टी कहलाती है, मगर यह भी उत्तर प्रदेश तक ही सीमटी हुई प्रतीत होती है। हालांकि चुनाव विधानसभा के हों या लोकसभा के इसके द्वारा अपने प्रत्याशी मैदान में जरुर उतारे जाते हैं। मगर, सफलता कम ही मिलती है, क्योंकि इसे भी केन्द्र में सत्ता में आने के लिए किसी न किसी पार्टी को समर्थन देना पड़ता है। जिस कारण कामयाबी कम ही हाथ लगती है।

कांग्रेस देश की सबसे पुरानी व बड़ी पार्टी मानी जाती है, परन्तु आज इसकी स्थिति भी किसी क्षेत्रीय पार्टी की तरह ही प्रतीत होने लगी है। क्योंकि, केन्द्रीय नेतृत्व की कमी से जूझ रही कांग्रेस ने किसी तरह से अपना वर्चस्व बचाने और इसे पुन: स्थापित करने के लिए जहां राहुल गांधी को तराशा वहीं प्रियंका गांधी को चुनाव मैदान एवं प्रचार में उतारने का जो तीर चलाया है उससे कांग्रेसियों को एक उम्मीद की किरण दिखने लगी है। अब सवाल यह पैदा होता है कि कांग्रेस भी अपने दम पर 543 सीटों पर नहीं लड़ रही तथा उसे भी कई पार्टियों का सहारा लेना पड़ा।

बात अगर भाजपा की करें तो पिछले चुनाव में अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब तो रही, मगर कार्यप्रणाली को लेकर उठाने वाले सवालों ने देश वासियों को काफी हद तक उससे दूर कर दिया है। क्योंकि सांसद की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करने के स्थान पर पार्टी द्वारा सिर्फ और सिर्फ मोदी-मोदी के नाम को एक लहर बनाकर पेश किया जा रहा है। भले ही लोग मोदी को पसंद करते हों, पर स्थानीय सांसद द्वारा विकास करवाने की अनदेखी किए जाने का दर्द भी उनके मन में तीर की तरह चुभता है। जिस कारण भाजपा की राह पहले की तरह आसान नजऱ नहीं आ रही। इतना ही नहीं आम आदमी पार्टी की तरफ ही भाजपा में भी तानाशाही रिवाज पनपने के कारण कई नेता और कार्यकर्ता काफी निराश नजर आ रहे हैं। जिसके कारण नुकसान नजर आ रहा है। परन्तु कांग्रेस व भाजपा की एक ही बात जो इन्हें सबसे मजबूत दावेदार बनाती है और वह है इनके द्वारा अधिक से अधिक सीटों से चुनाव लडऩा।

इन चुनावों में एक बात जो सबसे मजेदार लगती है और वो यह है कि थोड़ा समय पहले ही जन्मीं आप जैसी पार्टियां या वो पार्टियां जिनका जन्म तो बहुत पहले हुआ था, पर वे जनता के दिलों में जगह बनाने में नाकाम रही द्वारा देश के मुद्दों की बात कम की जा रही है और मोदी-शाह की जोड़ी को हटाने की योजनाएं ज्यादा बनाई जा रही हैं तथा इसके लिए वे किसी से भी गठजोड़ करने को तैयार बैठी हैं और राजनीतिक माहिरों का यह मानना है कि ऐसी पार्टियों से जनता को पूरी तरह से सुचेत रहने की जरुरत है और अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए मतदान करने की पहल कनी होगी ताकि जो भी सरकार बने वो देश का सोचे, देश वासियों का सोचे तथा इसके बाद उसके लिए अपनी पार्टी के विस्तार एवं स्वार्थ सिद्धी प्राथमिकता पर रहे।

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