
सियासत में कुछ लोग चमचों का रोल इतना बाखूबी निभाते हैं कि चमचा भी शर्मा जाए। यह वो किरदार है जिसे जमीर मार कर और खुद का किरदार गिराकर निभाया जाता है। इन दिनों बेशर्मी से भरे कुछेक चमचों का किरदार राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चाएं बटौर रहा है तथा एक पार्टी से दूसरी और दूसरी से पहली पार्टी में आए नेता के इर्द-गिर्द मंडराने वाले इन चमचों के अभिनय को देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे कि इस नेक कार्य को करने को वह किस प्रकार अपना सौभाग्य समझते हैं। एक से बढ़कर एक चाटूकार आका जी को ऐसे घेरे रहते हैं कि मानों उनसे बड़ा उनका कोई नहीं। जबकि मुसीबत के समय अधिकतर ने ऐसे किनारा कर लिया था जैसे…। दो-चार को छोड़कर आका के साथ कोई नज़र नहीं आया था, लेकिन चाटूकारिता में पीएचडी किए हुए किसी स्कालर को भी पीछे छोड़ने में महारत हासिल कर चुके इन चाटूकारों के अभिनय को देखकर आप भी गच्चा खा जाएं कि आखिर इतना हुनर यह लाते कहां से हैं। वैसे सच भी है कि अगर आप सियासत में हैं तो आपको कामयाब होने के लिए एक बात जरुर सीखनी होगी और वह है चमचागिरी, जीहजूरी, चाटूकारिता। स्वामी भक्त होना और चाटूकार होने में बहुत फर्क होता है।

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जो स्वामी भक्त होता है वह अपने स्वामी को सही और गलत के फर्क समझाकर उसे सियासत में आगे बढ़ने के मौके प्रशस्त करने में उसकी मदद करता है तो दूसरी तरफ चाटूकार स्वामी की नैय्या डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ता। क्योंकि उसे तो सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना होता है, फिर भाड़ में जाए स्वामी। चाटूकारिता की सबसे बड़ी डिग्री तो है, एक नहीं तो कोई नया स्वामी ढूंढ लेंगे इसमें क्या है। इसलिए तो कहा गया है कि स्वामी की गालियां खाकर, शब्दों के जूते खाकर भी जो उसकी दियोड़ी पर टिका रहे उससे बड़ा स्वामी भक्त चाटूकार कोई नहीं हो सकता। इसकी ताजा उदाहरण इन दिनों होशियारपुर के एक नेता के कार्यालय और निवास स्थान पर देखने को मिल जाती है, लेकिन कोई स्वामी भक्त ही इस पर गौर करता है। राजनीतिक माहिरों की मानें तो बोटियां बांटने में माहिर आका के गलियारों की शोभा बढ़ाते इन चाटूकारों के कारण ही उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी और एक बार फिर से वह उन्हीं रास्तों पर आगे बढ़ते हुए चाटूकारों से घिर उन्हें ही राजनीतिक आंगन की शोभा समझ बैठे हैं। जो उनके पतन का कारण कब बन जाएं इसके बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता। एक बात बताना तो भूल ही गया इनमें अधिकतर चाटूकार वो हैं जिन्हें गालियां देकर और भ्रष्ट व और भी न जाने क्या क्या कहकर कभी आका ने दहलीज से बाहर कर दिया था और ढेर सारी जलालत के बाद भी उसी दलहीज में कदम रखकर इन लोगों ने सिद्ध कर दिया है कि आगे बढ़ने के लिए कुछ भी करेगा और चाटूकारिता नीति पर अमल करते हुए आंखों का तारा बनने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे।
क्योंकि, आका खुश तो वह भी खुश यानि पद प्रतिष्ठा और थोड़ा बहुत बड़े नेताओं की आंखों में भी इमेज दुरुस्त। यह बात तो सभी को पता है कि जहां गुड़ वहीं चींटियां और मक्खियों का भरमार रहती है। नीम के पेड़ से तो वही गुण लेगा जो उसकी उपयोगिता को जानता होगा। हाल ही में थोड़े दिन पहले ही हमारे एक संवाददाता ने एक आका का सच जनता के समक्ष क्या रखा, चाटूकारों की भौंवे तन गईं और उन्होंने अनाप शनाप बोलने से भी परहेज नहीं किया। ऐसा लग रहा था मानों उनसे किसी ने उनकी डिग्री पूछ ली हो और उन्होंने अपने व्यवहार से उसे सिद्ध भी कर दिया हो। चलो हमें क्या जो चाटूकारिता करेंगे व करते हैं उन्हें करने दो, हमें तो वो कहना है, जो किसी किसी को पसंद आएगा। वैसे एक बात और है कि राजनेता कोई भी हो, उसके इर्द गिर्द चाटूकारों का जमावड़ा तो अकसर ही देखने को मिल जाता है, लेकिन इस आका ने ताजा ताजा दांव खेला है तो इसकी चर्चाओं से सियासी बाजार पूरी तरह से गर्माया हुआ है और लोग चाटूकारों की चापलूसी और जीहजूरी के किस्से एक दूसरे को सुनाकर ठहाके लगाना नहीं भूल रहे। हमें क्या जी, जो करेगा वो भरेगा और जिसके साथ करेगा वो भी भरेगा। अब यह तो आका ने देखना है कि उसे गुड़ की डली बनना है या फिर कुछ गुण नीम के भी धारण करने हैं। हमें दें इजाजत। जय राम जी की।











