
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़): पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा सेवा नहीं बल्कि एक वस्तु (कमोडिटी) के रूप में बदलती दिखाई दे रही है। अनेक निजी शैक्षणिक संस्थान पाठ्यक्रमों को उत्पाद की तरह बेच रहे हैं। आक्रामक प्रचार, बड़े-बड़े दावे और लाभ कमाने की प्रवृत्ति ने शिक्षा के मूल उद्देश्य—चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों और नवाचार—को पीछे छोड़ दिया है।

हाल ही में गलगोटिया यूनिवर्सिटी से जुड़ा प्रकरण एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है। ऐसी घटनाएँ न केवल संबंधित संस्थान की साख पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं, बल्कि पूरे देश की छवि को भी आघात पहुँचाती हैं।
आज कई प्रतिष्ठित निजी स्कूल और विश्वविद्यालय शिक्षा की गुणवत्ता, शोध और नैतिक शिक्षा की अपेक्षा प्रचार-प्रसार और ब्रांडिंग पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रीधारी तैयार करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनाना होना चाहिए।
प्रख्यात शिक्षाविद एवं समाजसेवी संजीव कुमार का कहना है कि वर्तमान समय में अनेक विश्वविद्यालयों के संचालक स्वयं संसद या राजनीति में प्रभावशाली पदों पर हैं। जब शिक्षा से जुड़े व्यवसायी ही नीतिनिर्माता बन जाते हैं, तो हितों के टकराव की संभावना बढ़ जाती है। इससे शिक्षा नीति के संतुलन और निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
पंजाब में सरकारी शिक्षण संस्थानों की स्थिति चिंताजनक है। अनेक सरकारी कॉलेज नियमित प्राध्यापकों के बिना चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों में भी लंबे समय से शिक्षकों की पर्याप्त भर्ती नहीं हुई है। सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय आर्थिक और प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण बंद होने की कगार पर हैं।
यदि यही स्थिति बनी रही तो गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा मध्यम और निम्न वर्ग के लिए और भी कठिन हो जाएगी।
शिक्षा कोई व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। इसे बाज़ार की वस्तु बनने से बचाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।










