
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि सदगुरु देव चमन लाल जी महाराज कहा करते थे कि हम संसार में इसलिए भटकते हैं क्योंकि हम गुरु के बताए मार्ग पर नहीं चलते। गुरु हमें कहते हैं कि हम ऋषियों के बताए हुए ज्ञान को अपने जीवन में धारण करें। इससे हमारा लोक और परलोक दोनों सुखी हो जाएंगे।

इसके लिए उन्होंने योग दिया है जिसका आधार मन है। मन के आधार पर ही योग का मार्ग बनता है। शास्त्र कहते हैं की मन से ही बंधन मिलता है और मन से ही मुक्ति मिलती है। जिस मन के आधार पर योग करना है वह ही स्थिर नहीं है तो फिर योग कैसे होगा। कई बार मन के अंदर इतना बड़ा भूचाल आता है की मन कहीं भी टिक नहीं पता। मन बड़ा चंचल है। मन को ठहराने के दो रास्ते हैं। एक यह कि मन के अंदर एक ऐसी मूर्ति स्थापित करें जिसमें मन ठहरे। मन में किसी न किसी स्वरूप की धारण करनी होती है। योग दर्शन कहता है कि योग के अंगों का पालन करने से मन शुद्ध होता है। अगर हम केवल सत्य को अपना लें तो मन शुद्ध हो सकता है।
हम किसी धार्मिक स्थान पर जाते हैं तो शुद्ध होकर जाते हैं। इसी तरह अगर मन के भीतर रखे स्वरूप के पास जाना है तो हमारा मन शुद्ध होना होगा। इसके बाद हमें अंदर जो स्वरूप धारण किया है उसको याद करते रहना है। जिस प्रकार माता से पुत्र अलग नहीं होना चाहता, इस तरह हमें भी ईश्वर से अलग नहीं होना है। योग में इसे धारणा कहते हैं। हमें अपने प्रयास से अपने चित्त को प्रभु के चरणों से बांधना है। धारणा के बाद ध्यान आता है। इस अवस्था में भगवान भगत का ध्यान रखते हैं जेसे मां बच्चे का ख्याल रखतीहै। इसके आगे समाधि की अवस्था होती है। इस अवस्था में परमात्मा का स्वरूप हमारे स्वरूप के साथ एक हो जाता है। इसमें भगत ईश्वर का स्वरूप हो जाता है।












