Wednesday, October 21, 2026
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अज्ञानता के पहरेदार: स्कूलों द्वारा अनुच्छेद 21-A के संवैधानिक उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

भारत में शिक्षा का अधिकार केवल एक सरकारी योजना या नीति नहीं है, यह एक मौलिक संवैधानिक अधिकार है। फिर भी समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ उन बच्चों को, जो कभी स्कूल नहीं गए या बीच में पढ़ाई छोड़ चुके हैं, विद्यालय में प्रवेश देने से मना कर दिया जाता है। यह स्थिति गंभीर कानूनी और सामाजिक प्रश्न खड़े करती है।

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एडवोकेट कनिका जैटली, संस्थापक – आशिरा फाउंडेशन, का कहना है कि ऐसी अस्वीकृति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संविधान और कानून द्वारा दिए गए अधिकारों का संभावित उल्लंघन भी है, जो हर बच्चे को शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं।

शिक्षा का संवैधानिक संरक्षण

बच्चों के शिक्षा के अधिकार की नींव Article 21A of the Constitution of India में निहित है, जो 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। यह प्रावधान राज्य और उसकी संस्थाओं पर यह स्पष्ट दायित्व डालता है कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

बच्चे को स्कूल से दूर रखना उसके ‘जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है। ड्रॉप-आउट बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से न जोड़कर, संस्थान परोक्ष रूप से बाल श्रम के चक्र को बढ़ावा दे रहे हैं—जो कि एक सामाजिक बुराई और दंडनीय अपराध दोनों है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत कानूनी व्यवस्था

इस संवैधानिक अधिकार को लागू करने के लिए Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 (आरटीई अधिनियम) बनाया गया, जिसका उद्देश्य उन बाधाओं को समाप्त करना है जो लंबे समय तक वंचित और हाशिए पर रहने वाले बच्चों को शिक्षा से दूर रखती रही हैं। इस कानून की कई धाराएँ विशेष रूप से ऐसे मामलों पर लागू होती हैं जहाँ बच्चों के पास पूर्व विद्यालय के रिकॉर्ड या दस्तावेज़ नहीं होते। धारा 3 प्रत्येक बच्चे को पड़ोस के स्कूल में निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार प्रदान करती है।

धारा 4 उन बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करती है जो कभी स्कूल में नामांकित नहीं हुए या जिन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी है। ऐसे बच्चों को आयु-उपयुक्त कक्षा में प्रवेश दिया जाना अनिवार्य है, और उन्हें अन्य विद्यार्थियों के स्तर तक लाने के लिए विशेष प्रशिक्षण (Special Training) या ब्रिज कोर्स उपलब्ध कराए जाने चाहिए, जो अक्सर विशेष प्रशिक्षण केंद्रों (STC) के माध्यम से संचालित किए जाते हैं। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएँ किसी बच्चे के प्रवेश में बाधा नहीं बन सकतीं।

धारा 5 के अनुसार यदि किसी बच्चे के पास ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) या पिछले स्कूल का रिकॉर्ड नहीं है, तो भी उसे प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार धारा 14 यह सुनिश्चित करती है कि आयु प्रमाण पत्र या अन्य दस्तावेज़ों की अनुपस्थिति भी प्रवेश से इनकार करने का आधार नहीं बन सकती। इसके अतिरिक्त, धारा 15 यह स्पष्ट करती है कि यदि कोई बच्चा औपचारिक प्रवेश अवधि के बाद भी प्रवेश के लिए आता है, तो भी विद्यालय का दायित्व है कि उसे प्रवेश देकर शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जाए। ये सभी प्रावधान इस बात को दर्शाते हैं कि किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक बाधा बच्चे के शिक्षा के अधिकार के रास्ते में नहीं आ सकती।

विशेष प्रशिक्षण केंद्रों की भूमिका

सरकारी शिक्षा कार्यक्रमों के अंतर्गत स्थापित विशेष प्रशिक्षण केंद्रों (STC) का उद्देश्य स्पष्ट है—आउट-ऑफ-स्कूल बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा में वापस लाना। ये केंद्र बच्चों को आवश्यक शैक्षणिक तैयारी और ब्रिज शिक्षा प्रदान करते हैं ताकि उन्हें उनकी आयु के अनुसार कक्षा में समायोजित किया जा सके। यदि ऐसे बच्चों को प्रवेश देने में बाधा उत्पन्न की जाती है, तो इससे न केवल इन केंद्रों की भूमिका कमजोर होती है बल्कि सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य को भी नुकसान पहुँचता है।

सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही

सरकारी विद्यालय सार्वजनिक संस्थान होते हैं जिन्हें संविधान और कानून के प्रावधानों को लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में यदि प्रशासनिक निर्णयों के कारण योग्य बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जाता है, तो यह कानूनी जवाबदेही और प्रशासनिक अतिक्रमण के प्रश्न खड़े करता है। एडवोकेट कनिका जैटली के अनुसार, कमजोर और वंचित बच्चों को प्रवेश से वंचित करना न केवल आरटीई अधिनियम की भावना के विपरीत है बल्कि इससे बच्चों को शिक्षा से और अधिक दूर धकेलने का खतरा भी पैदा होता है।

शिक्षा का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होना चाहिए

संविधान निर्माताओं और कानून बनाने वालों ने यह समझा था कि वंचित बच्चों के सामने सबसे बड़ी बाधा उनकी क्षमता नहीं बल्कि अवसरों की कमी होती है। इसलिए कानूनी ढाँचा इस प्रकार बनाया गया कि हर बच्चे—चाहे उसके पास दस्तावेज़ हों या नहीं, चाहे वह पहले कभी स्कूल गया हो या नहीं, को कक्षा में स्थान मिल सके। समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए यह आवश्यक है कि शिक्षा के दरवाज़े हमेशा खुले रहें, विशेष रूप से उन बच्चों के लिए जिन्हें शिक्षा प्रणाली में वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है।

लेखक:
एडवोकेट कनिका जैटली
संस्थापक– आशिरा फाउंडेशन

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