
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन ने कहा कि योग प्राचीनतम विद्या है। योग के द्वारा हम मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए गुरु के पास जाना पड़ता है। कलयुग में लोग योग को भूल चुके थे। ऐसे समय में प्रभु रामलाल जी ने योग की विद्या को फिर से हमारे सामने रखा। उन्होंने हमें योग की त्रिवेणी दी। हठयोग की विद्या दी। इसका अगर अभ्यास करें तो व्यक्ति दशम द्वार से प्राण त्याग कर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। उन्होंने हमें राजयोग भी दिया। हठयोग शरीर के साधनों द्वारा होता है।राजयोग बुद्धि के द्वारा होता है। इसमें मन की वृत्तियों को काबू करके हम ज्ञान द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। इसमें हम आत्मज्ञान तक पहुंच सकते हैं। तीसरा उन्होंने हमें भक्ति योग दिया है।

जैसे राजयोग के आठ अंग है हठयोग के सप्त साधन है। भक्ति योग के भी सात साधन है। पहले साधन है गुरु का मिलना। गुरु का मिलना आसान नहीं होता। रास्ते में कई भ्रांतियां होती हैं। संसार में विरले को ही गुरु मिलते हैं। जैसे लोहे और चुंबक में फर्क होता है इस तरह गुरु और शिष्य में भी अंतर होता है। योग्य शिष्य को गुरु चुंबक की तरह अपनी तरफ खींच लेते हैं। अगर गुरु नहीं मिलेगा तो भक्ति शुरू ही नहीं होगी। संसार की वासनाएं, माया, पदार्थ व्यक्ति को अपनी तरफ खींचती हैं। गुरु इंसान नहीं बल्कि परमेश्वर होता है जिसमें सभी शक्तियां होती हैं। जब गुरु मिल जाते हैं तो फिर अपना कुछ नहीं रहता। अगला चरण गुरु की सेवा होता है। जो गुरु कहे उसका पालन करो, यही सेवा होती है। गुरु से ज्ञान प्राप्त होता है, उस पर संशय नहीं करना चाहिए। गुरु के स्वरूप को हृदय में बसाओ। निराकार भक्ति मुश्किल होती है, साकार भक्ति आसान होती है। निराकार भगवान गुरु के रूप में साकार होते हैं। गुरु को देखें, उसे समझो तथा उसमें समाने का प्रयास करो।












