Sunday, October 4, 2026

    आई.आर.बी. की भर्ती पर लगा ग्रहण आज भी बरकरार

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    -भर्ती हुए 58 सिपाहियों को बिना बताए कर दिया नौकरी से बाहर-होशियारपुर। 1993 में हुई पंजाब पुलिस (आई.आर.बी.) की भर्ती को लगा ग्रहण आज भी बरकरार है। क्योंकि निकाले गए पुलिस मुलाजिमों को अब तक की किसी भी सरकार ने कोई सहायता प्रदान नहीं की है या इन मुलाजिमों की कोई बात नहीं सुनी।

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    आज की प्रैस कांफ्रैंस में अमृतसर, गुरदासपुर, जालंधर, फिरोजपुर, लुधियाना, मुक्तसर साहिब, चंडीगड़, पठानकोट, कपूरथला, तरनतारन व पंजाब के अन्य जिलों से आए थे जवान।
    सबने एकजुट होकरचेतावनी दी कि अगर विधानसभा चुनावों से पहले सरकार ने उनकी मांगों पर रहम के चलते कार्रवाई न की तो वे अपने परिवार सहित आत्महत्या करने पर मजबूर होंगे।

    23 वर्षों से प्रदेश के विभिन्न जिलों के सिपाहियों का न्याय प्रक्रिया से उठने लगा विश्वास

    राज्य में 1992 की कांग्रेस सरकार ने उस समय की केंद्र की कांग्रेस सरकार के साथ मिलकर पंजाब में बडे स्तर पर पंजाब पुलिस (आई.आर.बी.) के गठन का फैसला लिया था। उस समय पंजाब में आतंकवाद आखरी चरण में था। आतंकवादिआें को मुख्यधारा से जोडऩे तथा राज्य के युवाआें को रोज़गार के अवसर प्रदान करवाने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकार ने मिलकर इस भर्ती प्रक्रिया को करवाया था। जिसके लिए केंद्र व राज्य दोनों सरकारों द्वारा पचास पचास फीसदी खर्चे पर इसे शुरू करवाया गया था। केंद्र सरकार ने आई. आर.बी. की पांच यूनिट (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू तथा कश्मीर) की पांच बटालियन खड़ी करने के आदेश जारी किए थे।

    1993 से लेकर आज तक किसी भी सरकार ने नहीं सुनी इनकी फरियाद

    पंजाब सरकार ने पांच मई 1993 को अखबार तथा टी.वी. में इश्तेहार के माध्यम से भर्ती प्रक्रिया का एेलान किया था। जिसके लिए एक लाख से ज़्यादा नौजवानों के फार्म भरे गए। चुने गए उम्मीदवारों की पुलिस रिपोर्ट के बाद मैडिकल में फिट पाए गए युवकों को उनके घरों में लैटर आने के बाद नौकरी के प्रमाणपत्र दिए गए। जिन्हें बाद में मार्च 1994 में पटियाला में आई.जी. (आई.आर.बी.) ने चुने गए उम्मीदवारों को अलग अलग बटालियन के एक से ल कर पांच तक नंबर दे दिए। सभी उम्मीदवारों ने अपनी अपनी बटालियन में जाकर अपनी ड्यूटी ज्वाइन की। इस दौरान 1994 -95 तक उम्मीदवारों को नौकरी के लिए नंबर मिलते रहे हैं। उपरांत राज्य सरकार ने डेढ साल तक उम्मीदवारों को नौकरी का भरोसा दिया। उसके बाद ये कह कर नंबर देने बंद कर दिए के उनके पास जगह ही नहीं है। इसके बाद कुछ उम्मीदवारों द्वारा हाई कोर्ट में मई 1996 में इसके खिलाफ अपील की। जिसका फैसला 10 महीने बाद आया जिसमे मैरिट लिस्ट को सीरियल वाइज़ चलाने के हुक्म दिए गए। उसके बाद हाई कोर्ट के तीन बार दखल के बाद सितंबर 1997 को फैसला आया कि सरकार 15 दिन में सारी मैरिट लिस्ट को चलाए तथा सभी उम्मीदवारो को नंबर दिए जाएं। लेकिन समय की सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले से पहले जल्दबाजी में मैरिट लिस्ट को ही खत्म करवा दिया। मैरिट खत्म करने के बाद सरकार ने जल्दबाकाी में अलग अलग जिलों से संबंधित 71 नौकरी पर रखे जा चुके सिपाहिआें को बिना कारण नौकरी से चलता कर दिया। जिनमें जालंधर के 12 ,होशियारपुर के 10 ,कपूरथला के 8, अमृतसर के 14 ,गुरदासपुर के 8, फतेहगढ साहिब के 1, जिला फिरोज़पुर के 2 ,जिला पटिआला के 1, चंडीगढ से 1 तथा जिला मुक्तसर के 1 सिपाही का नाम भी आता है। बाकी रहते 12 सिपाहियोंं को हाई कोर्ट के आदेशानुसार पर नौकरी पर दोबारा रख लिया गया इसके उपरांत मैरिट ही समापत कर दी गई। पिछले 19 साल से ये सभी लगातार अपनी नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। समय समय पर अपनी समस्या को लेकर विभाग के उच्च अधिकारिआें से मिल कर अपनी बात रखते आ रहे हंै। लेकिन विभाग या सरकार की आेर से इन्हें कोई संतुष्ट जवाब ही नहीं मिल पाया है और न ही इन्हें सरकार तथा विभाग से कोई आगे उम्मीद रह गई है। पिछले 23 साल से लगातार भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देते आ रहे उम्मीदवारों का अब तो भारतीय न्याय प्रक्रिया से विश्वास उठता नकार आ रहा है।

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