
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि योग इस भ्रांति में नहीं रहता की हम जैसा भी कर्म करें भगवान हमें माफ कर देंगे। यह ईश्वर का नियम नहीं है। यह जीवन इक लंबी यात्रा है। मनुष्य जन्म भवसागर से पार होने के लिए मिला है। मनुष्य को ज्ञान व बुद्धि मिली है। अगर हम किसी गाड़ी को सफर पर ले जाते है तो पहले उसको चेक करते है उसकी ब्रेक आधी देखते है। हमारा शरीर भी एक यात्रा कर रहा है। हम ने भी इसे चेक करना है। हम इस तरफ ध्यान नहीं देते। गीता के छठे अध्याय में संयम योग की जानकारी दी गई है। वहां 12 संयम लिखे है। उन पर विचार करो। संयम को देखे तो शरीर मन बुद्धि है, सभी सयम इन से संबंध रखते है। पर इसके लिए भक्ति का होना जरूरी है। जो भक्ति करते हैं वह सर्वोत्तम है। भक्ति के लिए श्रद्धा होनी जरूरी है। भगवान का ध्यान करना आसान नहीं है। इसके लिए मन को।

टिकना मुश्किल है। भक्ति के बारे में किसी को पता नहीं लगना चाहिए। ध्यान करना है तो प्रभु चरणों में मन को टिकाऊ। बुद्धि मन को वंश में करेगी। मन इंद्रियों को वश में करेगी। संकल्प से उत्पन होने वाली कामनाओं को रोको। धीरे धीरे यतन करने से बात बन सकती है। पर धैर्य से काम लेना चाहिए। बुद्धि को संभालो। बुद्धि को गुरु चरणो में ले जा के ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। भगवान हमें योग के मार्ग पर ले जाना चाहते हैं। क्योंकि योग का उद्देश्य मोक्ष व मुक्ति है। लेकिन हम उसे याद भी नहीं करते कि इस जीवन में हमने मुक्ति प्राप्त करनी है। धर्म अर्थ काम प्राप्त करते हुए हमने मुक्ति तक पहुंचना है। रास्ते में अगर भटक जाएंगे तो मुक्ति प्राप्त नहीं होगी। योग के बिना भगवान की भी प्राप्ति नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि योग के तीन उद्देश्य हैं। भगवान ने हमें शरीर दिया है हमने इसे स्वस्थ रखना है। क्योंकि बिना स्वस्थ शरीर के मोक्ष के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती| इसके लिए उन्होंने योग के साधन हठयोग आदि दिए हैं। दूसरा उद्देश्य दृढ़ मन है। अगर मन कमजोर होगा तो कोई भी काम नहीं हो सकेगा। तीसरी चीज स्थिर बुद्धि है, अगर बुद्धि भटकती रहेगी तो मनुष्य भटक जाएगा। यह सभी उद्देश्य एक दूसरे से पूरी तरह से मिले हुए हैं। शारीर, मन व बुद्धि का पारस्परिक संबंध है। शरीर के लिए साधन है| लेकिन मन को दृढ़ करना आसान नहीं है। इसके लिए गीता में बताया गया है कि मन को दृढ़ करने के लिए मानसिक तप करना है। तप जेसा लोग समझते हैं वो तामसिक तप होता है।गीता के अनुसार मन का तप पांच तरह से होता है। मन हमेशा स्वच्छ रहे, मन प्रसन्न रहे, मन शांत रहे। मन का इन्द्रियों पर नियंत्रण हो तथा मन में शुद्ध भाव पैदा हो अन्यथा मन भटक जाएगा और हम मानसिक तप नहीं कर पाएंगे। मन को दृढ़ करने के लिए प्रतिदिन अभ्यास करना जरूरी है। इसके लिए समय का पाबंद होना जरूरी है। निरंतर अभ्यास से यह काम आसान हो जाता है। मन दृढ़ होगा तो बुद्धि स्थिर हो जाएगी।












