
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। अगर आप होशियारपुर में रहते हैं और आप राजनीतिक पहुंच रखते हैं तो आप एक बात अच्छे से समझ लें कि आप कानून एवं नियमों के विपरीत कोई भी कार्य कर सकते हैं। जिनमें सबसे जरुरी कार्य शामिल है, किसी भी तरह की इमारत का निर्माण करना। क्योंकि अकसर ही लोगों को शिकायत रहती है कि हम इमारत बनाने लगे थे तो हमें बनाने नहीं दी जा रही। लेकिन होशियारपुर में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहां राजनेताओं (खासकर सत्ताधारी आकाओं) ने ऐसा सिस्टम बना रखा है कि अगर अधिकारी नियमों की पालना करवाना भी चाहें तो वह चाह कर भी नहीं कर पा रहे तथा न ही उन्हें करने दिया जा रहा है। जिसके चलते घरेलू एवं व्यापारिक इमारतों के निर्माण से संबंधित सारे नियम छिक्के पर टंगे हुए नज़र आ रहे हैं। जिसके चलते शहर के स्वरुप पूरी तरह से बदलता हुआ नज़र आने लगा है तथा तंग होती सड़कों को खुली आंखों से देखते हुए भी राजनेता वोट की राजनीति की दलदल से निकलना जरुरी नहीं समझ रहे।

उक्त तस्वीर में आप जो इमारत देख रहे हैं वह सरकारी कालेज के सामने बन रही है और आपको बता दें कि इमारत के मालिक ने इसे बनाने के लिए नगर निगम से बाकायदा तौर पर रिहायशी नक्शा भी पास करवाया हुआ है तथा इसका निर्माण कार्य देखकर क्या आप कह सकते हैं कि यह रिहायशी इमारत के रुप में तैयार की जा रही होगी। नहीं, ऐसा इसलिए है कि इस कार्य के पीछे भी एक बड़े सत्ताधारी राजनेता का हाथ बताया जा रहा है। जिसने अधिकारियों के हाथ इस कद्र बांध दिए कि वह चाह कर भी असमर्थता की रस्सी से बंधे हुए हैं।
आप सोचिए कि अधिकारियों पर कितना दवाब होगा कि नींव से लेकर इतनी बड़ी इमारत बन जाने तक किसी ने इसे रोका नहीं। मीडिया द्वारा जब इस मामले को उठाया गया तो इसे लीगल करने एवं कार्यवाही से बचाने के लिए दूसरा रास्ता अख्तियार कर दिया गया। अब पता चला है कि उक्त इमारत के मालिक द्वारा लिखित दिया गया है कि वह इसका उपयोग घरेलू रुप में करेगा। यानि कि एक कागज ने राजनेता की नाक भी रख ली और इमारत के मालिक को कार्यवाही से भी बचा लिया। लेकिन, यह सभी जानते हैं कि रिहायशी नक्शे पर बनी इस इमारत का उपयोग एक न एक दिन कमर्शियल ही होना है और ऐसा कोई एक मामला नहीं, बल्कि कई मामले हैं, जहां पर राजनेताओं की शह पर दिनों मेें बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दी गईं। इससे पहले रिहायशी नक्शे पर एक अस्पताल की इमारत खड़ी करने का मामला प्रकाश में आया था। जिस पर कार्यवाही का नोटिस देने वाले अधिकारी को यह शाबाशी मिली थी कि उसे उच्चाधिकारियों ने सस्पैंड कर दिया तथा आज तक वह बहाल नहीं हुआ है। इसके पीछे भी एक बड़े राजनेता, जो सत्तापक्ष में सरकार की कैबिनेट में भी शामिल है का हाथ बताया जा रहा है। ऐसे में अधिकारी कार्यवाही करें भी तो कैसे। एक तरफ भ्रष्टाचार पर चोट तो दूसरी तरफ पूंजीपतियों पर दयालुता भरा राजनेताओं का हाथ।
खैर, अब देखना यह होगा कि अधिकारी वर्ग इस पर क्या कार्यवाही करता है तथा राजनेताओं का क्या रुख रहता है। क्योंकि, कट्टर ईमानदारों की सरकार के राजनेता ईमानदारी शब्द का प्रयोग शायद मंचों से किए जाने वाले भाषणों में ही करना उचित समझते हैं। जबकि जमीनी स्तर पर हकीकत कुछ और ही है।











