
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़): योग सदन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि हम हर समय भगवान से सहायता मांगते हैं लेकिन हमारा भी एक कर्त्तव्य है कि हम धर्म को कभी मत छोड़े। जब संसार पुकारता है तो भगवान धर्म की रक्षा के लिए आते हैं। लेकिन अगर आप पाप करोगे तो भगवान नाश भी कर सकते हैं। जो अपने धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। भगवान ने इंसान को बुद्धि दी है। बुद्धि से वह ज्ञान हासिल करे तो धर्म के मार्ग पर चल सकता है। अगर हम विद्या का ज्ञान हासिल करेंगे तो हमारा चरित्र बनेगा। चरित्र से वह पात्र बनता है।

इसीलिए चरित्र को सबसे बड़ा धन कहते हैं। धन चरित्र तथा ज्ञान हमारे पास हो तो हम धर्म पर चल सकते हैं। धन से पहले शरीर आता है और शरीर से भी धर्म होता है। हठयोग से शरीर ठीक रखा जा सकता है। इससे शरीर को स्वस्थ तथा शुद्ध रखना पड़ेगा। उसके लिए साधन करने पड़ेंगे। इसमें षट्कर्म, आसान, मुद्रा प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान और समाधि हैं । षट्कर्म के बिना शरीर शुद्ध नहीं हो सकता। उनमें नेति, धोती, बस्ती, नौली, त्राटक, कपालभाति आते हैं । धोती पांच तरह की होती है। एक अंतर धोती होती है। जो पेट की आंतों और गुदा तक को साफ कर देती है।आंतों को सभी बीमारियों की जड़ कहा जाता है। दूसरी दंत धोती है।
यह भी चार-पांच प्रकार की है। इसमें दंत, कान, काक, जिव्हा की शुद्धि शामिल है। जीभ शरीर में सबसे अधिक रस चूसती है। पहले जब दातुन करते थे तो उससे उसका रस भी अंदर जाता था। जीभ के मूल तक स्वाद नहीं पहुंचता। मूल को शुद्ध रखने के लिए बमन को गहराई से करो।












