बेहाल भाजपाः जनता के नकारे बनने चले सहारे, न हमारे न तुम्हारे, चुनाव कार्यालय से नहीं, कोठी से हो रहे इशारे

होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़), संदीप डोगरा। एक समय था जब किसी भी पार्टी की सियासत जिला पार्टी कार्यालय से चला करती थी। शायद उस समय के सियासतदान सिल्वर सपून लेकर पैदा नहीं होते होंगे तथा उन्हें इस बात की जानकारी होती होगी कि जनसेवक होना किसे कहते हैं और जीत का मंत्र किस प्रकार रटा एवं रटाया जाता है। लेकिन धीरे-धीरे जैसे ही सियासत में पूंजीपतियों की एंट्री हुई, तब से सियासत जिला कार्यालयों से निकलकर आकाओं की कोठियों में शिफ्ट हो गई। जहां पर आकाओं से जुड़े नेताओं एवं कार्यकर्ताओं का जमावड़ा तो लगने लगा, लेकिन पार्टी के लिए काम करने वाला जमीनी स्तर का कार्यकर्ता ठगा सा महसूस करने को विवश हो गया। जिस कारण पार्टियों में गुटबाजी जन्म लेने लगी और सियासत की सारी कहानी, दिशा एवं दशा ही बदल गई।

Advertisements

इन दिनों पंजाब में बेहाल भाजपा के होशियारपुर में हालात एसे हैं कि गुटों में बटी भाजपा के एक नेता की षड्यंत्रकारी सियासत से जहां जिला कार्यकारिणी अनदेखी का शिकार महसूस कर रही है वहीं जिला प्रधान के करीबियों का कहना है कि तुसी जिला कार्यकारिणी दी गल्ल करदे हो, अत्थे जिला प्रधान नूं कोई नी पुछदा, इह तां पार्टी हाईकमांड ई आ जेहड़ी उस नूं ताकत देई जांदी आ। नहीं तां इक नेता ने तां हुण तक….।

उनके द्वारा इशारों में की गई बात थोड़ा कहे को ज्यादा समझे वाली कहावत चरितार्थ कर गई। कुल मिलाकर कहा जाए तो इस चुनाव में भाजपा की स्थिति पर दृश्टि डाली जाए तो एक गुट के प्रभुत्व के चलते जहां अन्य गुट अभी भी खुलकर नहीं चल रहे वहीं जो साथ हैं उनमें भी चंद कमाऊ पुत्तों के अलावा कोई दूसरा नज़र नहीं आ रहा। जिसके चलते भाजपा के जीत के दावे दूर की कौड़ी दिखाई दे रहे हैं। आम जनता का मत है कि यह छोटे नेता तो वैसे ही आपस में लड़ रहे हैं, जो पहले पांच साल नज़र नहीं आए वो बाद में क्या नज़र आएंगे? क्योंकि, जीत या हार के बाद सभी की निगाहें और रंग-ढंग बदल ही जाता है, यह सभी जानते हैं और होशियारपुर की जनता इसका अनुभव कर चुकी है। तो एसे में जिला स्तर के नेताओं को आपसी एकता व प्यार बनाए रखने पर भी ध्यान देना चाहिए।

जनता द्वारा कई बार नकारे गए एक नेता जी की कार्यप्रणाली से लगता ही नहीं कि वह लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं, उनकी हरकतों एवं सियासती पैंतरेबाजी से लगता है कि वह अपना बर्चस्व बचाने के लिए लड़ाई को कोई और ही रंगत देने के प्रयास में हैं। जिसके चलते उनके द्वारा जहां जिला टीम द्वारा बनाई गई टीमों में फेरबदल जारी है वहीं उनके द्वारा जिला प्रधान जैसे महत्वपूर्ण पदों की अनदेखी करके खुद के खासमखासों एवं करीबियों को महत्व देने के प्रयास जारी हैं। जिसका प्रमाण आज उनके खेमे से भेजे गए एक प्रैस नोट में देखने को मिला, जिसमें पूर्व अधिकारियों एवं पदाधिकारियों के नाम तो पढ़ने को मिले, लेकिन जिला प्रधान का नाम गायब था।

जिससे पार्टी के भीतर मचे घमासान के संकेत साफ देखने को मिल जाते हैं। वैसे भी पार्टी सूत्रों की माने तो जनता द्वारा नकारे गए नेता जी को इतनी चिंता पार्टी उम्मीदवार की जीत या हार की नहीं जितनी उन्हें अपना वर्चस्व बचाने एवं 2027 की तैयारी की है। क्योंकि, इस वार के मतदान से तय होगा कि आखिर भाजपा का वोट बैंक कितना है और कितना पार्टी के साथ है। इसी के आधार पर वह 2027 में विधानसभा की टिकट का दावा ठोकने का मन बनाए बैठे हैं। राजनीतिक माहिरों की माने तो चंद खासमखासों के सहारे पार्टी उम्मीदवार की नैया पार लगाने की सोच रखने वाले नेता जी को पार्टी में दूर-दूर तक नज़र दौड़ा लेनी चाहिए कि उनके आसपास वही सिर्फ हारे हुए नहीं हैं, बल्कि तत्कालीन पार्टी गठजोड़ एवं पार्टी में शामिल हुए कई नेता हैं, जो हार का मुंह देख चुके हैं व उन्हीं के सहारे वह नैया पार का सपना देख रहे हैं, जिसे तर्कसंगत कहना शायद तर्कसंगत शब्द का अपमान कहा जा सकता है।

अन्य दो गुटों की बात करें तो उनसे जुड़े अधिकतर कार्यकर्ता इस बात से नाराज होकर घर बैठे हैं कि जब एकाधिकार के चलते पार्टी उच्चाधिकारियों को कोई दूसरा नज़र ही नहीं आ रहा तो वह अपना समय और ऊर्जा क्यों खर्च करें तथा अगर पार्टी उच्चाधिकारी सभी का समान सम्मान चाहते हैं तो फिर उन्हें सभी को बराबर बांटकर जिम्मेदारियां देने में क्या हर्ज है। इसके साथ-साथ पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं में इस बात की भी चर्चा है कि पार्टी द्वारा जब चुनाव कार्यालय खोला गया है तो फिर इसके बावजूद कोठी से एसी कौन सी सियासत हो रही है, जिसके बारे में कार्यकर्ता या पार्टी उच्चाधिकारी अंजान हैं। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि पंजाब में आप, कांग्रेस, किसानों, अकालियों एवं बेरोजगारों के साथ-साथ पिछले सांसद की कार्यप्रणाली के रोष से बेहाल जनता को कौन सा टानिक राहत पहुंचाएगा। लेकिन इतना जरुर है कि फिलहाल तो समस्त भाजपा नेताओं के लिए मोदी जी का नाम ही उनके लिए तारणहार दिखाई दे रहा है।

वैसे भी चर्चा है कि अधिकतर पार्टी नेता यही सोच कर बैठे हैं कि हालात तो पतलें हैं ही, अगर जीत गए तो हमने जिताया और अगर हार गए तो पिछले सांसद के प्रति जनता के रोष ने हराया कहकर अपना पल्ला झांड़ लेंगे। यानि कि दोनों हालातों में लड्डू अपने हाथ में रखे हुए यह नेता पार्टी का कितना नुकसान कर रहे हैं, इसकी जानकारी भले ही पार्टी हाईकमांड को होगी, मगर, चुनाव के चलते वह भी सारा खेल देखकर चुप्पी साधे बैठने में ही भलाई समझे बैठे हों। पार्टी से जुड़े कुछेक नेताओं के अनुसार सारे हालातों पर पार्टी हाईकमांड द्वारा नज़र रखी जा रही है और कौन किस चाल में है और चल रहा है इसकी सारी जानकारी उनके पास है, यानि बोले तो बराबर हिसाब होगा का डायलाग चरितार्थ होता भविष्य में नज़र आएगा।

परन्तु एकाधिकार और चौधरी बनने के सुख के चक्कर में अभी और कितने कार्यकर्ता एवं पार्टी नेताओं को बलि चढ़ा दिया जाता है, यह भी आने वाला समय ही बताएगा। परन्तु मौजूदा समय में एकाधिकार की जंग में और उम्मीदवार के सहारे अपने लिए भविष्य की मीडिया मैनेजमैंट के घटिया हथकंडों ने पार्टी के भीतर और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार पूरी तरह से गर्म करके रखा हुआ है। जिसकी जानकारी संगठन के अधिकारियों तक पहुंच चुकी है और आने वाले समय में यह जानकारी कौन सी चिंगारी का रुप धारण करेगी, इसकी जानकारी के लिए हमें थोड़ा इंतजार तो करना ही होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here