
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़): दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) के स्थानीय आश्रम गौतम नगर में साप्ताहिक आध्यात्मिक सत्संग समारोह का आयोजन किया गया। इस पावन अवसर पर संस्थान के संस्थापक एवं संचालक आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री दीपिका भारती ने अपने ओजस्वी और विचारोत्तेजक विचारों से संगत को निहाल किया। अहोई अष्टमी के अवसर पर प्रचलित लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों का मर्मस्पर्शी विश्लेषण करते हुए साध्वी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में विभिन्न पर्वों से जुड़ी पौराणिक या पारंपरिक कथाएं भले ही कालखंड के अनुसार जनमानसिकता में लोक मान्यताओं का रूप ले चुकी हों, परंतु उनके पीछे छिपा मूल संदेश हमेशा एक ही रहता है—वह है निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और संतति के कल्याण की मंगल कामना।

प्राचीन लोक आख्यान में एक माता द्वारा अनजाने में हुए पाप का प्रायश्चित करने और अपने संतानों की रक्षा के लिए अहोई माता की आराधना का उल्लेख मिलता है। यह कथा प्रतीक रूप में यह दर्शाती है कि माता का हृदय अपनी संतान के सुख और दीर्घायु के लिए किसी भी सीमा तक त्याग करने को तत्पर रहता है। परंतु, विचारणीय विषय यह है कि क्या केवल शारीरिक संरक्षण या पारंपरिक व्रत-नियमों से ही संतान का भविष्य पूरी तरह सुरक्षित हो सकता है? इतिहास साक्षी है कि माता यशोदा का वात्सल्य हो या माता जीजाबाई की प्रेरणा, जब-जब मातृ-शक्ति ने अपनी संतान को उच्च नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से सींचा है, तब-तब समाज को महान विभूतियां प्राप्त हुई हैं। साध्वी जी ने चुटकी लेते हुए कहा कि आज की आधुनिक माताएं बच्चों के केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और करियर की चिंता में घुली जाती हैं, जबकि वास्तविक संरक्षण उनके चरित्र और विचारों की पवित्रता में निहित है।
सत्संग के दौरान समकालीन परिप्रेक्ष्य और आध्यात्मिक समाधान पर प्रकाश डालते हुए साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि भौतिकवादी युग में युवा पीढ़ी को भटकाव, तनाव और नैतिक पतन से बचाने के लिए केवल उपदेश देना पर्याप्त नहीं है। जिस प्रकार एक मां अपनी संतान के शारीरिक पोषण का ध्यान रखती है, उसी प्रकार एक पूर्ण गुरु अपने शिष्य के आत्मिक पोषण और सर्वांगीण विकास का दायित्व संभालते हैं। सद्गुरु का अपने शिष्यों के प्रति वात्सल्य किसी भी लौकिक माता के प्रेम से अनंत गुना अधिक दिव्य और निष्काम होता है। सद्गुरु शिष्य के भीतर छिपे दुर्गुणों को दूर कर उसके चरित्र को सुदृढ़ बनाते हैं ताकि उसका भविष्य न केवल उज्ज्वल बल्कि आत्मकल्याण से परिपूर्ण हो। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के असीम मार्गदर्शन में संस्थान आज ब्रह्मज्ञान की वही सनातन और व्यावहारिक दीक्षा जन-जन तक पहुंचा रहा है। जब मनुष्य को पूर्ण गुरु के माध्यम से ब्रह्मज्ञान यानी आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, तो उसके भीतर का विवेक जाग्रत होता है। यही आत्मज्ञान व्यक्ति के भीतर सुसंस्कारों का सिंचन करता है और उसे जीवन के सही मार्ग पर अग्रसर करता है। गुरु का वात्सल्य और आत्मज्ञान का प्रकाश मिलकर ही एक चरित्रवान, संस्कारी और सशक्त भावी पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं। सत्संग के समापन पर ब्रह्मज्ञान के ध्यान में लीन होकर आत्मिक शांति की अनुभूति की।












