Sunday, November 1, 2026
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जो बीमारियां दवाईयां से ठीक नहीं होती वह योग के कुछ साधनों से ही ठीक हो जाती हैंः आचार्य

होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के प्रवचन के दौरान मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि योग लाखों वर्षों पहले ऋषियों की खोज है।  जिसमें बताया गया है कि जीवन को कैसे सफल बनाया जा सकता है।  यह सभी देशों और कालों के लिए सुखदायक है। आजकल के विज्ञान की तरह नहीं जो कभी-कभी नाश का कारण भी बनता हैं।  जापान और भोपाल गैस त्रासदी इसके उदाहरण है।  योग हमेशा सुख देता है।  ऋषियों का जीवन अपने ग्रंथों के अनुकूल था।  भगवान हमें योग देने आए हैं।  लेकिन हम लेने के अधिकारी नहीं बन पा रहे।  वह संसार की माया के स्वामी थे।  लेकिन हम संसार की माया के दास  है। हम माया के लिए कुछ भी कर सकते हैं।  धर्म अहिंसा और सत्य पर आधारित है। आज यह दोनों दूर होते जा रहे हैं।   

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आज का संसार माया के लिए धर्म को छोड़ सकता है।  वह समय अलग था जब सत्य धर्म के लिए भगवान राम ने राज्य छोड़ दिया था।  श्रवण कुमार ने धर्म के लिए अपने प्राण दे दिए। ऋषियों ने कहा है कि हमें शरीर मिला है।  धर्म के लिए यह जरूरी है।  उसे ठीक रखने के लिए उन्होंने हठयोग के साधन दिए हैं। जो बीमारियां दवाइयां से ठीक नहीं होती वह योग के कुछ साधनों से ही ठीक हो जाती है।  योग के साधन अमृत है।  शरीर को शास्त्रों में अनमय कोष कहा गया है।  अगर हम सात्विक बने तो यह हमें सुखी कर सकता है।  शरीर को दीर्घायु बना सकता है।  लेकिन हमने गलत अहार से इसे रोगमय कोष बना लिया है।  उन्होंने कहा कि मन में शरीर के साथ बुद्धि है। 

ऋषि शरीर के साथ मन को भी सुखी रखते थे।  मन का काम विचार करना है।  इसमें भाव चलते रहते हैं।  भाव गलत होंगे तो यह दुखी हो जाएगा।  गीता में लिखा है कि अगर दुखों को दूर करना है तो मन को साफ करो।  मन को शुद्ध करने के लिए ज्ञान जरूरी है।  इससे मन एकाग्र होता है।  मन में जन्म-जन्मांतर के संस्कार है।  लेकिन हमने इसको चिंतामय कोष बना दिया है।  इसमें चिंताएं ही भरी पड़ी है।  मन को हर समय प्रभु भक्ति में मस्त  रखो। मन के आगे बुद्धि है।  इसे विज्ञानमय कोष कहा गया है।  लेकिन इसमें भ्रम और अज्ञान भरा हुआ है।  इसे ठीक करने के लिए हमें ज्ञान की प्राप्ति करनी होगी।  हमने इसे भ्रममय कोष बना दिया है।  हम तरह-तरह के भ्रम में फंसे हुए हैं।  इसके आगे आत्मा है।  जिसे आनंद मय कोष कहते हैं।  जो आत्मा तक पहुंच जाता है उसे और कुछ नहीं चाहिए।  आत्मा के आगे केवल मोक्ष है।

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