
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। हर वर्ष 23 मार्च को विश्वभर में जमाअत अहमदिया अपना स्थापना दिवस बड़े उत्साह, श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाती है। यह दिन केवल एक धार्मिक समुदाय की स्थापना का प्रतीक नहीं, बल्कि शांति, प्रेम, सुधार और मानवता की सेवा के संदेश को उजागर करने वाला है। 23 मार्च 1889 को हजरत मिर्जा गुलाम अहमद (अलैहिस्सलाम) ने पंजाब के छोटे से गाँव क़ादियान में जमाअत अहमदिया की नींव रखी। उन्होंने लुधियाना में अपने पहले अनुयायियों से बैअत (निष्ठा की शपथ) लेकर इस आंदोलन की शुरुआत की। उनका उद्देश्य था इस्लाम के मूल और शांतिपूर्ण संदेश को पुनर्जीवित करना और समाज में फैली अंधविश्वास, कट्टरता और अन्याय जैसी बुराइयों को खत्म करना। 19वीं सदी के अंत में भारतीय उपमहाद्वीप धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। इस्लाम के नाम पर कई गलत प्रथाएं चल रही थीं और नैतिक पतन अपने चरम पर था। ऐसे समय में हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने खुद को मसीह-ए-मौऊद और महदी घोषित करते हुए एक नए युग की शुरुआत की, जिसने मानवता के लिए नई उम्मीद और रोशनी जगाई।


जमाअत अहमदिया का मूल मंत्र है – “प्रेम सभी के लिए, घृणा किसी के लिए नहीं”। यह नारा तब भी प्रासंगिक था और आज के समय में इसकी आवश्यकता और भी अधिक महसूस होती है। हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने इस्लाम के नाम पर फैल रही हिंसा और जिहाद की गलत व्याख्या का खंडन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि असली जिहाद तलवार से नहीं, बल्कि आत्म-संयम, ज्ञान और नैतिक सुधार से होता है। उनकी शिक्षाओं ने अहमदियों को हर परिस्थिति में शांति, सहिष्णुता और मानवता की सेवा का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया। जमाअत अहमदिया ने अपनी स्थापना के प्रारंभिक वर्षों से ही शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने अपने अनुयायियों को ज्ञान प्राप्त करने, समाज में सेवा भाव अपनाने और मानवता की भलाई के लिए आगे आने का संदेश दिया।
आज जमाअत अहमदिया विश्व के कई देशों में स्कूल, अस्पताल और मानव सेवा परियोजनाएं चला रही है। भारत, पाकिस्तान, अफ्रीका और यूरोप जैसे अनेक क्षेत्रों में इस समुदाय ने गरीबी उन्मूलन, शिक्षा प्रसार और सामाजिक सुधार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अपनी स्थापना से लेकर अब तक, जमाअत अहमदिया ने कई धार्मिक विरोध, उत्पीड़न और चुनौतियों का सामना किया है। कट्टरपंथियों द्वारा भारी विरोध और अत्याचार झेलने के बावजूद, इस समुदाय ने अहिंसा, धैर्य और शांति के मार्ग को कभी नहीं छोड़ा। आज भी कई देशों में अहमदियों को अपने विश्वास के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे खलीफा-ए-वक्त के मार्गदर्शन में शांति और धैर्य के साथ अपने मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। 23 मार्च का दिन अहमदियों के लिए आत्मविश्लेषण, नवीकरण और संकल्प का अवसर होता है। इस दिन विशेष प्रार्थनाएं, सभाएं और कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिनमें हजरत मिर्जा गुलाम अहमद की शिक्षाओं को याद कर, उनके द्वारा दिए गए संदेश को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया जाता है। यह दिन सिर्फ अतीत की यादें ताजा नहीं करता, बल्कि आने वाले समय में शांति, प्रेम और सुधार का संदेश समाज के हर कोने तक पहुंचाने की प्रेरणा भी देता है। जमाअत अहमदिया का स्थापना दिवस एक ऐसी ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है, जिसने दुनिया को शांति, प्रेम और मानवता की सेवा का रास्ता दिखाया।
यह दिन हमें यह समझाने के लिए काफी है कि सच्ची ताकत हिंसा और नफरत में नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और सुधार में होती है। 23 मार्च का यह पावन दिन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो दुनिया में शांति, प्रेम और समृद्धि की कामना करता है।











