
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में रविवार के प्रवचन के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि गुरु शिष्य के लिए जो कर सकते हैं वह कोई भी नहीं कर सकता। इसीलिए गुरु को ईश्वर माना गया है। गुरु ईश्वर की सृष्टि को निखारता है। गुरु हमारे जीवन के माली है। गीता ने लिखा है कि भगवान ने संसार के अंदर दो तरह के स्वभाव के मनुष्य पैदा किए हैं। एक अच्छे स्वभाव वाले और एक बुरे स्वभाव वाले। गीता में लिखा है कि भगवान ने दो तरह की सृष्टि पैदा की है एक देव और दूसरी असुर। कई लोगों का दैविक स्वभाव होता है और कई लोगों का आसुरी स्वभाव होता है। ईश्वर ही कांटा बनाता है और ईश्वर ही फूल बनाता है। दोनों का स्वभाव अलग-अलग है। कांटा चुभता है और फूल सुगंध देता है। कांटा तो फूल नहीं बन सकता लेकिन आसुरी स्वभाव वाला मनुष्य दैविक स्वभाव वाला बन सकता है। अगर हम आसुरी स्वभाव वाले हैं और गुरु के पास जाकर दैविक स्वभाव वाले बन जाए तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है।

जिनसे दैविक गुण होते हैं उनको मुक्ति मिलती है। जो आसुरी स्वभाव वाले होते हैं वह नरक में जाते हैं। दैविक स्वभाव बालों के 26 गुण बतलाए हैं। हम एक को अपना ले, बाकी खुद ही आ जाते हैं। एक गुण है मन शुद्ध होना। मन चंचल है कभी बुराई की तरफ जाता है कभी अच्छाई की तरफ जाता है। गुरु की संगत में रहकर मन साफ हो जाता है। गुरु की संगत कुछ समय करने से ही वह हमारे भीतर मन को साफ करने का गुण पैदा कर देते हैं। दैविक स्वभाव वाला सत्संग में जाएगा जबकि आसुरी स्वभाव वाला दुनिया के काम में लगा रहेगा। दूसरा है दान। जरूरतमंद को किया दान सात्विक दान होता है। राजसिक और तामसिक दान तो कोई मायने नहीं रखता। सात्विक दान से मन प्रसन्न रहता है। इसके अतिरिक्त बुरी इच्छाओं को दबाना है। मन हमेशा दूसरों से ईर्ष्या के बारे में सोचता रहता है।राजसिक वृत्तियों को सात्विक वृत्तियों में बदलना होगा। देविक स्वभाव वालों का समय स्वाध्याय में बीतेगा।











