
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़): योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि जो हर समय प्रभु भक्ति में लीन रहता है वही सच्चा भक्त होता है। बिना गुरु के पास जाए सच्ची भक्ति प्राप्त नहीं होती। गीता में भगवान ने साफ कहा है कि जब तक तुम गुरु के पास जाकर उसकी सेवा नहीं करोगे उससे अपने प्रश्न नहीं पूछोगे तब तक कोई भक्ति काम नहीं आएगी। शिक्षा गुरु से मिलती है।

अनेकों शास्त्र है जिन्हें समुद्र कहा जाता है। गुरु समुद्र से ज्ञान रूपी पानी को बादल बनाकर ऊपर लाता है और अपने शिष्य पर बरसता है। जो ज्ञान के भंडार होते हैं उन्हें हम दर्शन कहते हैं। उसको समझाने वाला भी कोई होना चाहिए। जो समझाता है उसे शास्त्र कहते हैं। हमारे पास योग दर्शन है। उसको पढ़ो। गुरु और शिष्य की बात को उपनिषद कहते हैं। चित वृत्तियां पर काबू पाने को योग कहते हैं। इसके लिए यम नियम बताए गए हैं। मन दिखाई नहीं देता। लेकिन इंद्रियों को काबू करो यह सामने दिखाई देती है। इंद्रियां बड़ी प्रबल है। यहीं से योग शुरू होता है। अपनी दिनचर्या ठीक करो।
हमारी तो जुबान ही बस में नहीं आती। हमारी रसना, दृष्टि, कान काबू में नहीं है। इंद्रियों को काबू करके ही हम मन तक पहुंच सकते हैं। मन इंद्रियों से भी ज्यादा प्रबल है। गीता में साफ़ लिखा है कि योग एक जन्म का काम नहीं है। निरंतर अभ्यास से मन समाधि की तरफ जाता है। जिनमें पूर्व जन्म के पुण्य कर्म होते हैं उनकी समाधि जल्दी लग जाती है। जिनके बस में प्रकृति होती है वह अवतार होते हैं। गीता में भगवान ने कहा है कि जब-जब धर्म की हानि होती है तब मैं आता हूं। इसके आगे बुद्धि है। बुद्धि को खराब होते देर नहीं लगती। जो काम बुद्धि कर सकती है वह कोई नहीं कर सकता। जिसकी बुद्धि बस में होती है उसे स्थिर बुद्धि कहते हैं। बुद्धि ही परमात्मा को जान सकती है। मन और बुद्धि ज्ञान प्राप्त करने के साधन है।












